चित्तौड़गढ़ का अनोखा गांव मांदलदा, एक्सक्लूसिव फुटेज में देंखे जहां घरों के बीच उगे पेड़ और आस्था के आगे झुकी आधुनिकता
राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में एक ऐसा अनोखा गांव है, जहां प्रकृति और आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यह गांव है पुरोहितों का सांवता ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाला ‘मांदलदा’, जहां पेड़ न सिर्फ घरों के आंगन में बल्कि बाथरूम, किचन, कमरों, बरामदों और यहां तक कि गांव की सड़क के बीचों-बीच भी खड़े नजर आते हैं। खास बात यह है कि इन पेड़ों को हटाने या काटने की कल्पना भी यहां के लोग नहीं करते।
मांदलदा गांव की पहचान उसकी वर्षों पुरानी धार्मिक मान्यताओं और प्रकृति संरक्षण के प्रति अटूट आस्था से जुड़ी हुई है। गांव में बने कई मकान ऐसे हैं, जिनकी दीवारों और छतों के बीच से पेड़ निकल रहे हैं। यदि किसी परिवार को अपने पुराने मकान का रिनोवेशन करवाना भी होता है, तो मकान का नक्शा पहले से मौजूद पेड़ों के अनुसार ही तैयार किया जाता है। यानी पेड़ नहीं हटते, बल्कि मकान की बनावट बदल दी जाती है।
गांव में निकलने वाली मुख्य सड़क भी इस अनोखी परंपरा की गवाह है। सड़क के बीच में खड़ा पेड़ आज भी अपनी जगह पर मौजूद है और उसके चारों ओर से रास्ता निकाल लिया गया है। ग्रामीणों का कहना है कि यह पेड़ सिर्फ एक पेड़ नहीं, बल्कि उनकी आस्था और पहचान का प्रतीक है।
मांदलदा गांव में मान्यता है कि किसी भी पेड़, उसकी टहनी या यहां तक कि पत्तियों को काटना भी अपराध के समान माना जाता है। इसके पीछे धार्मिक कारण है। ग्रामीणों का विश्वास है कि भगवान देवनारायण ने स्वयं गांववासियों को पेड़ों की रक्षा करने की आज्ञा दी थी। इसी वजह से यहां पीढ़ियों से पेड़ों को देवतुल्य माना जाता रहा है।
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि भगवान देवनारायण के प्रति गहरी श्रद्धा के चलते यहां प्रकृति संरक्षण अपने आप में एक परंपरा बन गया है। यही कारण है कि गांव में जन्म लेने वाले हर परिवार के पहले बच्चे का नामकरण भी भगवान देवनारायण के पांच नामों में से किसी एक नाम पर किया जाता है। इस वजह से गांव में नारायण, भैरू, देवा जैसे नामों वाले लोगों की संख्या काफी अधिक है।
ग्रामीणों का कहना है कि इस परंपरा के कारण गांव में हरियाली आज भी बरकरार है। जहां आसपास के इलाकों में तेजी से पेड़ कटते जा रहे हैं, वहीं मांदलदा गांव आज भी हरा-भरा नजर आता है। गर्मी के मौसम में भी यहां का वातावरण अपेक्षाकृत ठंडा रहता है, जिसका श्रेय इन पेड़ों को दिया जाता है।
मांदलदा गांव आज के दौर में पर्यावरण संरक्षण का एक जीवंत उदाहरण बन चुका है। आधुनिक विकास और सुविधाओं के बीच भी यहां के लोग अपनी आस्था और परंपराओं से समझौता नहीं करते। यह गांव न सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह संदेश भी देता है कि विकास और प्रकृति संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं।

