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एडमिट कार्ड नहीं मिला तो पहले ही दिन छूटी बोर्ड परीक्षा, वीडियो में देखें रोने लगा पिता, बोले हमारी बेटी का भविष्य खराब हो जाएगा

एडमिट कार्ड नहीं मिला तो पहले ही दिन छूटी बोर्ड परीक्षा, वीडियो में देखें रोने लगा पिता, बोले हमारी बेटी का भविष्य खराब हो जाएगा

राजस्थान के नदबई से शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक चिंताजनक मामला सामने आया है। यहां सरकारी स्कूल में पढ़ने वाली 10वीं कक्षा की एक छात्रा को एडमिट कार्ड नहीं मिलने के कारण बोर्ड परीक्षा के पहले ही दिन परीक्षा से वंचित रहना पड़ा। इस घटना के बाद छात्रा और उसका परिवार गहरे सदमे में है।

जानकारी के अनुसार, साधना कपूरी देवी स्थानीय सूरजमल जगवायन राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक स्कूल में कक्षा 10वीं की छात्रा है। गुरुवार से उसकी बोर्ड परीक्षा शुरू हुई थी। वह अपने माता-पिता के साथ समय पर स्कूल पहुंची ताकि एडमिट कार्ड लेकर परीक्षा केंद्र जा सके, लेकिन वहां स्टाफ ने उसे एडमिट कार्ड देने से इनकार कर दिया।

परिजनों का आरोप है कि स्कूल प्रशासन ने कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया, जिससे छात्रा परीक्षा में शामिल नहीं हो सकी। परीक्षा का पहला दिन होने के बावजूद उसे वापस लौटना पड़ा।

छात्रा के पिता ने भावुक होकर हाथ जोड़कर स्कूल प्रशासन से एडमिट कार्ड जारी करने की गुहार लगाई। उन्होंने कहा कि उनकी बेटी पूरे साल मेहनत से पढ़ाई कर रही थी और बोर्ड परीक्षा को लेकर बेहद उत्साहित थी। लेकिन प्रशासनिक लापरवाही के कारण उसका साल खराब होने का खतरा खड़ा हो गया है।

परिवार का कहना है कि यह केवल एक छात्रा का मामला नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की गंभीर खामी को उजागर करता है। अगर समय पर एडमिट कार्ड जारी कर दिया जाता, तो छात्रा परीक्षा दे सकती थी। स्थानीय लोगों ने भी इस घटना पर नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि बच्चों के भविष्य से जुड़ी ऐसी लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जानी चाहिए। प्रशासन को तुरंत हस्तक्षेप कर छात्रा को न्याय दिलाना चाहिए।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बोर्ड परीक्षा छात्रों के जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव होती है। ऐसे में किसी भी तकनीकी या प्रशासनिक गलती से छात्र का साल बर्बाद हो सकता है। इसलिए स्कूलों को इस तरह के मामलों में अतिरिक्त सतर्कता बरतनी चाहिए।

फिलहाल, परिवार स्कूल प्रशासन से एडमिट कार्ड जारी करने और वैकल्पिक व्यवस्था की मांग कर रहा है ताकि छात्रा आगे की परीक्षाएं दे सके। यह घटना एक बार फिर सवाल खड़ा करती है कि क्या सरकारी तंत्र छात्रों के भविष्य को लेकर पर्याप्त संवेदनशील है या नहीं।

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