भरतपुर में मियावाकी तकनीक से विकसित हो रहा मिनी जंगल, वीडियो में देंखे वन्यजीवों को मिलेगा नया आशियाना
राजस्थान के भरतपुर जिले में पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीवों के लिए अनुकूल आवास तैयार करने की दिशा में एक अहम पहल की जा रही है। यहां जापानी मियावाकी तकनीक के जरिए मिनी जंगल विकसित किया जा रहा है। फिलहाल इस परियोजना के तहत सवा बीघा जमीन पर करीब 8 हजार पौधे लगाए गए हैं। यदि यह प्रयोग सफल रहता है, तो भविष्य में और अधिक जमीन लेकर बड़े स्तर पर जंगल विकसित करने की योजना है, जिसे वन्यजीवों और पक्षियों के रहने के लिए पूरी तरह अनुकूल बनाया जाएगा।
यह मिनी जंगल भरतपुर के आमोली इलाके में विकसित किया जा रहा है। बताया जा रहा है कि बाण गंगा नदी के सूखने के बाद इस क्षेत्र की करीब 256 बीघा जमीन लंबे समय से बंजर पड़ी हुई थी। इसी बंजर भूमि को हरित क्षेत्र में बदलने के उद्देश्य से करीब दो साल पहले मियावाकी फॉरेस्ट विकसित करने का प्लान तैयार किया गया। अब इस योजना को धरातल पर उतारा जा रहा है।
मियावाकी तकनीक मूल रूप से जापान की एक आधुनिक और प्रभावी वनीकरण तकनीक है, जिसमें बहुत कम जगह पर अधिक घने जंगल विकसित किए जाते हैं। इस तकनीक में स्थानीय प्रजातियों के पौधों को वैज्ञानिक तरीके से एक-दूसरे के नजदीक लगाया जाता है, जिससे वे तेजी से बढ़ते हैं और कुछ ही वर्षों में प्राकृतिक जंगल जैसा स्वरूप ले लेते हैं। आमतौर पर जहां जंगल विकसित होने में दशकों लग जाते हैं, वहीं मियावाकी तकनीक से 8 से 10 गुना तेजी से हरियाली विकसित होती है।
वन विभाग और पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, इस मिनी जंगल से न केवल वातावरण शुद्ध होगा, बल्कि क्षेत्र में जैव विविधता को भी बढ़ावा मिलेगा। घना जंगल तैयार होने के बाद यहां पक्षियों के साथ-साथ छोटे और बड़े वन्यजीवों को भी सुरक्षित आसरा मिल सकेगा। खासतौर पर जंगली जानवरों के साथ हो रहे सड़क हादसों को देखते हुए उन्हें प्राकृतिक आवास में बसाने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
भरतपुर से पहले दौसा जिले में भी मियावाकी तकनीक से करीब 12 बीघा क्षेत्र में जंगल विकसित किया जा चुका है, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। वहां हरियाली बढ़ने के साथ-साथ पक्षियों और जीव-जंतुओं की आवाजाही भी बढ़ी है। इसी सफलता को देखते हुए भरतपुर में भी इस तकनीक को अपनाया गया है।
स्थानीय प्रशासन का मानना है कि अगर आमोली क्षेत्र में विकसित किया जा रहा यह मिनी जंगल सफल रहता है, तो आने वाले समय में बंजर पड़ी अन्य जमीनों को भी इसी मॉडल पर हरित क्षेत्र में बदला जाएगा। इससे न केवल पर्यावरण संतुलन मजबूत होगा, बल्कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में भी मदद मिलेगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि मियावाकी फॉरेस्ट शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकता है, जहां जगह की कमी के बावजूद हरियाली विकसित करना जरूरी है। भरतपुर में शुरू की गई यह पहल आने वाले समय में राजस्थान के अन्य जिलों के लिए भी एक उदाहरण बन सकती है।
कुल मिलाकर, मियावाकी तकनीक से विकसित हो रहा यह मिनी जंगल भरतपुर के पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक उम्मीद भरी शुरुआत है, जो भविष्य में बड़े जंगल का रूप लेकर क्षेत्र की तस्वीर बदल सकता है।

