बाड़मेर में रमजान और होली में साम्प्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल: हिंदू-मुस्लिम साथ में करते हैं गैर
देश की पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान से सटे राजस्थान के बाड़मेर जिले में रमजान के पाक महीने और फाल्गुन के होली महोत्सव के दौरान हिंदू और मुस्लिम समुदायों के लोग सामूहिक रूप से गैर नृत्य करके सदियों पुरानी परंपरा को जीवित रख रहे हैं। यह परंपरा धार्मिक भिन्नताओं के बावजूद दोनों समुदायों के बीच भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक बनी हुई है।
जानकारी के अनुसार, रमजान के दौरान मुस्लिम समुदाय के लोग दिन में रोजा रखते हैं। जैसे ही सूरज ढलता है, रात के समय हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग पारंपरिक वेशभूषा में ढोल की थाप पर सामूहिक रूप से गैर नृत्य करते हैं। इस दौरान पूरा माहौल उत्सव और मेलजोल से भर जाता है।
85 वर्षीय सुलेमान इस परंपरा के सबसे सक्रिय संरक्षक हैं। वे दोनों समुदायों की नई पीढ़ी को गैर नृत्य सिखाते हैं और इस सांस्कृतिक धरोहर को आने वाले समय के लिए संजोने का काम कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह नृत्य सिर्फ एक खेल या मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह लोगों को आपसी भाईचारे, सम्मान और सहयोग की भावना से जोड़ने का माध्यम है।
स्थानीय लोग भी इस परंपरा को बहुत मानते हैं और इसे अपनी पहचान का हिस्सा मानते हैं। बड़े बुजुर्गों से लेकर युवा और बच्चे तक हर उम्र के लोग इस सांप्रदायिक उत्सव में शामिल होकर क्षेत्र में सामूहिक सौहार्द का संदेश फैलाते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि बाड़मेर की यह परंपरा देशभर में सामाजिक एकता और धार्मिक सहिष्णुता की मिसाल है। रमजान और होली के मेल से उत्पन्न यह अनोखा सांस्कृतिक संगम यह साबित करता है कि धर्म भिन्न हो सकता है, लेकिन मानवता और भाईचारे की भावना हमेशा समान रहती है।
इस परंपरा ने बाड़मेर को न केवल सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध किया है, बल्कि पूरे देश के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण पेश किया है कि कैसे विविधता में एकता संभव है।

