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Allahabad सुरक्षा 35 हजार किलोमीटर रेल ट्रैक पर कवच लगाने को मंजूरी

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उत्तरप्रदेश न्यूज़ डेस्क  मालागाड़ी और कंचनजंघा एक्सप्रेस ट्रेन में भिड़ंत के बाद टक्कररोधी तकनीक कवच योजना फास्ट ट्रैक पर आ गई है. रेलवे बोर्ड ने भारतीय रेल के प्रमुख और व्यस्ततम रेल नेटवर्क पर कवच लगाने का एक्शन प्लान तैयार कर लिया है. इसके तहत 35,736 किलोमीटर ट्रैक पर कवच लगाने की मंजूरी दी गई है.

कचव तकनीक ट्रेनों की आमने-सामने और पीछे से टक्कर रोकने में सक्षम है. इसमें ड्राइवर के चूक करने पर कवच ट्रेनों में ऑटोमैटिक ब्रेक लगा देता है. रेलवे बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि एक्शन प्लान में रेलवे के स्वर्मिण चतुर्भुज (गोल्डन क्वॉडलेटरल) यानी दिल्ली-कोलकाता, दिल्ली-चेन्नई, दिल्ली-मुंबई, चेन्नई-कोलकाता एवं स्वर्मिण विकर्ण (गोल्डन डायगनल) के दिल्ली-चेन्नई, मुंबई-कोलकाता रेलमार्ग पर चरणबद्ध तकनीक से कवच लगाया जाएगा. यह देश के सबसे प्रमुख और व्यस्ततम रेलमार्ग हैं, जहां यातायात का भारी दबाव व कंजेशन रहता है. इसकी लंबाई लगभग 35,736 किलोमीटर है. अधिकारी ने बताया कि रेलवे बोर्ड ने इसकी मंजूरी दे दी है.

अधिकारी ने बताया कि स्वर्मिण चतुर्भुज (गोल्डन क्वॉडलेटरल) एवं स्वर्मिण विकर्ण (गोल्डन डायगनल) रूट पर 10000 किलोमीटर टैक पर कवच लगाने के लिए सर्वे का काम अंतिम चरण में है. इसके पश्चात जल्द ही टेंडर प्रक्रिया शुरू की जाएगी. इस पर लगभग 5,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे. वहीं, लगभग 3,000 किलोमीटर दिल्ली-मुंबई और दिल्ली-कोलकाता रेलमार्ग पर कवच लगाने का काम चल रहा है. वर्तमान में 700 किलोमीटर ट्रैक पर कवच लगाया जा चुका है. दोनों रूट पर कवच सहित अन्य रेल संरक्षा कार्य के लिए ,000 करोड़ रुपये पहले ही आवंटित किए जा चुके हैं.

जटिल तकनीक के कारण हो रही देरी रेल विशेषज्ञों के अनुसार, ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन सिस्टम (एटीपीएस) यानी कवच एक अत्यंत जटिल तकनीक है. कवच में नियम है कि एक ट्रैक पर ट्रेन के आमने-सामने आने पर 300 मीटर पहले कवच ट्रेन में ऑटोमैटिक ब्रेक लगा देता है. तकनीक अड़चन यह है कि मालगाड़ियां, लोकल ट्रेनें, मेल-एक्सप्रेस, राजधानी-शताब्दी-वंदे भारत ट्रेनें पृथक गति पर चलती हैं. वहीं, रेलमार्गो पर डबल ट्रैक व मल्टीपल ट्रैक सहित लूप लाइनें होती हैं. इसलिए कवच में उक्त जटिलाताओं को दूर करने के लिए कई तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है. वहीं, ट्रेन-मालगाड़ी के इंजनों में डिवाइस लगाया जाता है, जबकि ट्रैक के किनारे ऑप्टिकल फाइबर बिछाने के साथ सेंसर लगता है. रेलवे स्टेशनों पर जीपीएस की मदद से ट्रेनों की निरंतर लोकेशन पता रखने के लिए कंप्यूटर सिस्टम लगाया जाता है.

 

 

इलाहाबाद न्यूज़ डेस्क

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