दिहाड़ी मजदूर के बेटे ने रचा इतिहास, अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में जीता स्वर्ण पदक
कहते हैं कि अगर इरादे मजबूत हों और मेहनत सच्ची हो तो कोई भी बाधा सफलता की राह नहीं रोक सकती। इस कहावत को सच साबित कर दिखाया है एक साधारण परिवार से आने वाले बेटे ने, जिसने अपनी मेहनत और लगन के दम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीतकर देश और प्रदेश का नाम रोशन कर दिया।
इस होनहार खिलाड़ी की मां दिहाड़ी मजदूरी करती हैं, जबकि पिता एक छोटी सी परचूनी की दुकान चलाकर परिवार का पालन-पोषण करते हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी, लेकिन बेटे के सपनों को कभी कमजोर नहीं होने दिया गया। सीमित संसाधनों के बावजूद उसने अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए दिन-रात मेहनत की।
खिलाड़ी ने बताया कि बचपन से ही उसे खेलों में रुचि थी, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण शुरुआत में कई परेशानियों का सामना करना पड़ा। कई बार खेल का सामान खरीदने तक के पैसे नहीं होते थे, लेकिन उसके माता-पिता ने अपनी जरूरतों में कटौती कर बेटे के सपनों को पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मां ने मजदूरी कर और पिता ने दुकान से बचत कर बेटे की ट्रेनिंग का खर्च उठाया।
उसकी मेहनत रंग लाई और उसे अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में देश का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। इस बड़े मंच पर उसने शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया। जैसे ही यह खबर उसके घर और इलाके में पहुंची, खुशी की लहर दौड़ गई। पूरे गांव और शहर में जश्न का माहौल बन गया और लोगों ने उसे बधाइयां दीं।
खिलाड़ी ने अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता और कोच को दिया। उसने कहा कि अगर परिवार और गुरु का साथ नहीं मिलता तो यह मुकाम हासिल करना संभव नहीं था। उसका कहना है कि यह तो सिर्फ शुरुआत है और वह भविष्य में देश के लिए और भी पदक जीतना चाहता है।
माता-पिता की आंखों में बेटे की इस उपलब्धि पर गर्व साफ नजर आया। उन्होंने कहा कि आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने हमेशा बेटे को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया और आज उसकी मेहनत ने सब कुछ सफल कर दिया।
यह कहानी न केवल युवाओं के लिए प्रेरणा है, बल्कि यह भी साबित करती है कि सफलता पाने के लिए संसाधनों से ज्यादा जरूरी मेहनत, आत्मविश्वास और मजबूत इरादे होते हैं। इस बेटे की उपलब्धि ने यह संदेश दिया है कि सपने चाहे कितने भी बड़े क्यों न हों, अगर उन्हें पाने का जज्बा हो तो हर मुश्किल आसान हो जाती है।

