आर्थिक स्वतंत्रता में कौन आगे, कौन पीछे? नई रैंकिंग में भारत 88वें नंबर पर, हांगकांग और सिंगापुर का जलवा बरकरार
Economic Freedom Index 2026: आर्थिक स्वतंत्रता के मामले में भारत की रैंकिंग में गिरावट दर्ज की गई है। फ्रेजर इंस्टीट्यूट, कनाडा की ओर से जारी Economic Freedom of the World: 2026 Annual Report में भारत 6 पायदान नीचे खिसककर 88वें स्थान पर पहुंच गया है। इस सूची में हांगकांग पहले स्थान पर बना हुआ है, जबकि स्विट्जरलैंड दूसरे और सिंगापुर तीसरे स्थान पर है। अमेरिका को पांचवां स्थान मिला है।रिपोर्ट के मुताबिक, भारत को 10 में से 6.62 अंक मिले हैं। पिछले साल भारत 6.66 अंकों के साथ 82वें स्थान पर था। यानी इस बार भारत की रैंकिंग के साथ-साथ स्कोर में भी गिरावट आई है। भारत में यह रिपोर्ट सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (CCS) और फ्रेजर इंस्टीट्यूट के संयुक्त तत्वावधान में जारी की गई।
आर्थिक स्वतंत्रता में कौन से देश सबसे आगे?
इकोनॉमिक फ्रीडम इंडेक्स में उन देशों का आकलन किया जाता है, जहां लोगों और कारोबारियों को आर्थिक गतिविधियां करने, व्यापार करने, संपत्ति रखने और बाजार में काम करने की कितनी स्वतंत्रता मिलती है।
2026 की रैंकिंग में हांगकांग ने पहला स्थान बरकरार रखा है। स्विट्जरलैंड दूसरे और सिंगापुर तीसरे नंबर पर हैं। अमेरिका पांचवें स्थान पर है, जबकि ब्रिटेन को 10वां स्थान मिला है। जापान 13वें और जर्मनी 19वें नंबर पर है।
अन्य प्रमुख देशों की स्थिति पर नजर डालें तो फ्रांस 39वें, इटली 47वें, दक्षिण कोरिया 53वें, ब्राजील 85वें और रूस 143वें स्थान पर हैं।
भारत के पड़ोसी देशों की रैंकिंग कैसी रही?
इस रिपोर्ट में भारत के कई पड़ोसी देशों की रैंकिंग भी भारत से नीचे रही है। हालांकि, कुछ देशों की स्थिति भारत से बेहतर या अलग-अलग मानकों पर भिन्न हो सकती है।
| देश | रैंकिंग |
|---|---|
| चीन | 110 |
| नेपाल | 90 |
| पाकिस्तान | 133 |
| बांग्लादेश | 129 |
| श्रीलंका | 119 |
इन आंकड़ों के अनुसार, भारत 88वें स्थान पर है, जबकि नेपाल 90वें नंबर पर है। चीन 110वें, श्रीलंका 119वें, बांग्लादेश 129वें और पाकिस्तान 133वें स्थान पर है।
किन आधारों पर तैयार होता है इकोनॉमिक फ्रीडम इंडेक्स?
Economic Freedom of the World: 2026 Annual Report में दुनिया के 165 देशों की आर्थिक स्वतंत्रता का आकलन किया गया है। इसके लिए पांच प्रमुख क्षेत्रों को आधार बनाया जाता है।
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सरकार का आकार: अर्थव्यवस्था में सरकार की भूमिका, सरकारी खर्च और कर व्यवस्था।
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कानूनी व्यवस्था और संपत्ति के अधिकार: कानून का शासन, संपत्ति की सुरक्षा और अनुबंधों का पालन।
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वैश्विक व्यापार की स्वतंत्रता: अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बाधाएं और दूसरे देशों के साथ कारोबार करने की आजादी।
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नियमन: कारोबार, श्रम और ऋण बाजारों पर लागू नियमों का प्रभाव।
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मुद्रा की स्थिरता: भरोसेमंद मुद्रा तक पहुंच और मौद्रिक स्थिरता।
इन मानकों के आधार पर देशों को अंक दिए जाते हैं और फिर उनकी रैंकिंग निर्धारित की जाती है।
भारत की रैंकिंग गिरने पर क्या बोले विशेषज्ञ?
रिपोर्ट जारी करते हुए सेंटर फॉर सिविल सोसायटी के CEO डॉ. अमित चंद्रा ने कहा कि इस साल भारत की रैंकिंग में गिरावट आई है। उनके मुताबिक, अलग-अलग मानकों पर भारत की स्कोरिंग भी पिछले वर्ष की तुलना में कमजोर रही।फ्रेजर इंस्टीट्यूट के अर्थशास्त्रियों के अनुसार, कोविड-19 महामारी के दौरान कई देशों ने आर्थिक गतिविधियों पर अतिरिक्त नियम लागू किए। व्यापार में बाधाएं बढ़ीं, सरकारी खर्च और सरकार की भूमिका का विस्तार हुआ तथा मुद्रा आपूर्ति में भी वृद्धि हुई। इन कारणों से वैश्विक स्तर पर आर्थिक स्वतंत्रता प्रभावित हुई।रिपोर्ट के मुताबिक, महामारी के बाद कई सरकारों ने अपनी नीतियों में बदलाव किए, लेकिन इसके बावजूद अनेक देशों की आर्थिक स्वतंत्रता महामारी से पहले के स्तर पर वापस नहीं पहुंच सकी।
क्या भारत की रैंकिंग में गिरावट चिंता का विषय है?
भारत की रैंकिंग में छह स्थान की गिरावट आर्थिक नीतियों, व्यापारिक माहौल, नियमन और संपत्ति के अधिकारों जैसे विषयों पर चर्चा को महत्वपूर्ण बनाती है। हालांकि, किसी एक सूचकांक की रैंकिंग से पूरी अर्थव्यवस्था की स्थिति का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए आर्थिक विकास दर, रोजगार, निवेश, महंगाई और लोगों की आय जैसे दूसरे संकेतकों को भी देखना जरूरी है।यह भी ध्यान देने योग्य है कि 2026 में जारी यह रिपोर्ट वर्ष 2024 के आंकड़ों पर आधारित है। इसलिए इसकी रैंकिंग को 2026 में देश की आर्थिक स्थिति का तत्काल आकलन नहीं माना जाना चाहिए।

