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RBI Repo Rate: महंगाई और क्रूड का बढ़ता दबाव, दिसंबर तक दो बार रेपो रेट बढ़ने की चर्चा
 

RBI Repo Rate: महंगाई और क्रूड का बढ़ता दबाव, दिसंबर तक दो बार रेपो रेट बढ़ने की चर्चा

देश में महंगाई को लेकर चिंता एक बार फिर बढ़ती नजर आ रही है। खाने-पीने की चीजों से लेकर ईंधन और दूसरी वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी का असर अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। इसी बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति को लेकर भी बाजार में चर्चा तेज हो गई है। रिपोर्टों के मुताबिक, दिसंबर 2026 तक रेपो रेट में दो बार बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है।

अक्टूबर और दिसंबर में बढ़ सकता है रेपो रेट
द हिंदु के एक एनालिसिस के मुताबिक, RBI अक्टूबर और दिसंबर में रेपो रेट में 25-25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी कर सकता है। यानी दोनों बार 0.25 प्रतिशत की वृद्धि होने पर कुल बढ़ोतरी 0.50 प्रतिशत हो सकती है।

मौजूदा रेपो रेट 5.25 प्रतिशत है। अगर दोनों संभावित बढ़ोतरी होती हैं तो यह दर बढ़कर करीब 5.75 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। यहां 100 बेसिस पॉइंट 1 प्रतिशत के बराबर होते हैं, जबकि 25 बेसिस पॉइंट 0.25 प्रतिशत होते हैं।
महंगाई पर RBI की नजर
रेपो रेट में संभावित बदलाव के पीछे महंगाई को अहम कारण माना जा रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, जुलाई 2026 में खुदरा महंगाई 4.45 प्रतिशत थी, जो अगस्त में बढ़कर 4.82 प्रतिशत हो गई। कुछ अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि सितंबर में यह आंकड़ा करीब 5 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।
महंगाई में लगातार तेजी बनी रहती है तो RBI के सामने कीमतों को नियंत्रित करने और आर्थिक गतिविधियों को समर्थन देने के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती बढ़ सकती है।

कच्चे तेल की कीमतों से बढ़ सकती है परेशानी
महंगाई के मोर्चे पर कच्चे तेल की कीमत भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। सिस्टमैटिक्स ग्रुप के अनुसार, अगर क्रूड ऑयल की कीमत 90 से 110 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में बनी रहती है, तो महंगाई RBI के पहले के अनुमान से ऊपर जा सकती है।
कच्चा तेल महंगा होने से परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ सकती है। इसका असर कंपनियों की लागत पर पड़ता है और इसका कुछ हिस्सा ग्राहकों तक पहुंचने पर वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें भी बढ़ सकती हैं।
बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त नकदी भी एक वजह
RBI की नीति पर बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी का भी असर पड़ सकता है। HSBC के विश्लेषण के मुताबिक, विदेशी मुद्रा प्रवाह और खास तौर पर FCNR(B) डिपॉजिट के जरिए बैंकिंग सिस्टम में बड़ी मात्रा में नकदी आई है।

रिपोर्ट में करीब 15 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त लिक्विडिटी का उल्लेख किया गया है। बैंकिंग सिस्टम में जरूरत से ज्यादा नकदी रहने पर अर्थव्यवस्था में मांग और कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई जाती है।
आम लोगों पर क्या पड़ेगा असर?
अगर आने वाले महीनों में रेपो रेट बढ़ता है, तो इसका असर बैंकिंग सेक्टर पर दिखाई दे सकता है। होम लोन, पर्सनल लोन और दूसरे फ्लोटिंग रेट वाले कर्ज की ब्याज दरों में बदलाव की संभावना रहती है। हालांकि वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि बैंक RBI के फैसले को अपनी ब्याज दरों में किस हद तक शामिल करते हैं।
फिलहाल रेपो रेट में बढ़ोतरी को लेकर अंतिम फैसला RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक में ही होगा। इसलिए अक्टूबर और दिसंबर की संभावित बढ़ोतरी को अभी अनुमान के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
 

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