RBI Governor Warning: बैंकिंग सिस्टम मजबूत, फिर भी मंडरा रहा नए संकट का खतरा! आरबीआई गवर्नर ने किया आगाह
पश्चिम एशिया समेत दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जारी आर्थिक और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच भारत की वित्तीय व्यवस्था को लेकर एक अहम बात सामने आई है। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने वित्तीय स्थिरता को लेकर सतर्क रहने की जरूरत बताई है।कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन 2026 में केंद्रीय बैंकिंग और वित्तीय स्थिरता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के दौरान उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आज वित्तीय व्यवस्था मजबूत नजर आ रही हो, लेकिन इससे यह मान लेना सही नहीं होगा कि भविष्य में किसी तरह का जोखिम पैदा नहीं हो सकता।इस बार कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन की थीम “Resilience in an Age of Flux” यानी अनिश्चितता के दौर में सुदृढ़ता रखी गई है। सम्मेलन में वैश्विक आर्थिक झटकों, तकनीकी बदलाव, वित्तीय जोखिम और बदलते अंतरराष्ट्रीय माहौल से निपटने के तरीकों पर चर्चा हो रही है।
लंबे समय तक स्थिरता से बढ़ सकता है जोखिम
वित्तीय व्यवस्था में लंबे समय तक स्थिरता रहने पर आमतौर पर बाजार से जुड़े लोग और संस्थान ज्यादा जोखिम लेने की ओर बढ़ सकते हैं। इसी दौरान कर्ज का स्तर भी बढ़ सकता है।
ऐसे में मौजूदा समय में वित्तीय स्थिति मजबूत होने के बावजूद भविष्य में पैदा होने वाले जोखिमों पर लगातार नजर रखना जरूरी हो जाता है। वित्तीय स्थिरता सिर्फ मौजूदा हालात को देखने से नहीं, बल्कि संभावित जोखिमों की पहले से पहचान करने से भी जुड़ी है।
अगला वित्तीय संकट सिर्फ बैंक से नहीं आएगा
बदलते वैश्विक माहौल में वित्तीय संकट का कारण केवल बैंक या कोई बड़ी वित्तीय संस्था ही हो, यह जरूरी नहीं है। तकनीक पर बढ़ती निर्भरता के साथ जोखिमों का स्वरूप भी बदल रहा है।
भू-राजनीतिक घटनाएं, साइबर हमले, तकनीकी गड़बड़ियां और वैश्विक वित्तीय नेटवर्क में किसी तरह की बड़ी समस्या का असर कई क्षेत्रों तक पहुंच सकता है।
यही वजह है कि वित्तीय स्थिरता को अब सिर्फ बैंकिंग सिस्टम तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता।
भू-राजनीतिक घटनाएं बन सकती हैं चुनौती
दुनिया में होने वाली बड़ी भू-राजनीतिक घटनाओं का असर ऊर्जा कीमतों, व्यापार, सप्लाई चेन और वित्तीय बाजारों पर पड़ सकता है। कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन में भी वैश्विक झटकों, ऊर्जा जोखिमों, सप्लाई-चेन में रुकावट और आर्थिक अनिश्चितताओं को प्रमुख चर्चा के विषयों में शामिल किया गया है।
ऐसे घटनाक्रम का असर सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से निवेश, पूंजी प्रवाह और आर्थिक गतिविधियों पर पड़ सकता है।
साइबर अटैक और तकनीकी गड़बड़ी भी बड़ा जोखिम
डिजिटल पेमेंट और ऑनलाइन बैंकिंग के बढ़ते इस्तेमाल के साथ वित्तीय व्यवस्था तकनीक पर पहले से ज्यादा निर्भर हो गई है। ऐसे में किसी बड़े साइबर हमले या महत्वपूर्ण तकनीकी सिस्टम में गड़बड़ी का असर सिर्फ एक कंपनी तक सीमित नहीं रह सकता।
पेमेंट सिस्टम, बैंकिंग सेवाओं और दूसरी डिजिटल वित्तीय सेवाओं में लंबे समय तक रुकावट आने पर इसका व्यापक असर पड़ सकता है। इसलिए साइबर सुरक्षा और मजबूत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर भी वित्तीय स्थिरता का महत्वपूर्ण हिस्सा बनते जा रहे हैं।
सिर्फ बैंकों पर नजर रखना काफी नहीं
वित्तीय स्थिरता का दायरा बैंकिंग सिस्टम से कहीं ज्यादा बड़ा है। NBFC, शेयर बाजार, पेमेंट सिस्टम, टेक्नोलॉजी इंफ्रास्ट्रक्चर और महत्वपूर्ण थर्ड-पार्टी सर्विस प्रोवाइडर्स भी वित्तीय व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं।
आज एक वित्तीय संस्था की सेवाएं दूसरी संस्था के डिजिटल सिस्टम, टेक्नोलॉजी या पेमेंट नेटवर्क से जुड़ी हो सकती हैं। इसलिए किसी एक हिस्से में पैदा हुई समस्या दूसरे हिस्सों तक भी पहुंच सकती है।
दुनिया से जुड़ी वित्तीय व्यवस्था में बाहरी असर भी अहम
भारत की अर्थव्यवस्था वैश्विक व्यापार और वित्तीय बाजारों से जुड़ी हुई है। ऐसे में किसी दूसरे देश या अंतरराष्ट्रीय बाजार में पैदा होने वाली बड़ी वित्तीय समस्या का असर दूसरे देशों तक पहुंच सकता है।
इसी वजह से वैश्विक पूंजी प्रवाह, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय नेटवर्क और बाहरी आर्थिक झटकों पर नजर रखना भी जरूरी है।
मजबूत स्थिति का मतलब जोखिम खत्म होना नहीं
RBI गवर्नर की बात का प्रमुख संदेश यही है कि मौजूदा वित्तीय मजबूती को भविष्य के जोखिमों से सुरक्षा की गारंटी नहीं माना जाना चाहिए। केंद्रीय बैंकिंग की भूमिका में वित्तीय स्थिरता, पूंजी प्रवाह और वैश्विक झटकों के बीच जोखिमों को संभालना महत्वपूर्ण बना हुआ है। कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन का केंद्रीय फोकस भी बदलते वैश्विक माहौल में आर्थिक मजबूती और लचीलेपन पर है।
यानी भारतीय वित्तीय व्यवस्था के लिए चुनौती सिर्फ आज की स्थिति को मजबूत बनाए रखना नहीं है, बल्कि आने वाले समय में पैदा होने वाले साइबर, तकनीकी, भू-राजनीतिक और वित्तीय जोखिमों से निपटने की तैयारी भी बनाए रखना है।
पश्चिम एशिया समेत दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जारी आर्थिक और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच भारत की वित्तीय व्यवस्था को लेकर एक अहम बात सामने आई है। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने वित्तीय स्थिरता को लेकर सतर्क रहने की जरूरत बताई है।
कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन 2026 में केंद्रीय बैंकिंग और वित्तीय स्थिरता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के दौरान उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आज वित्तीय व्यवस्था मजबूत नजर आ रही हो, लेकिन इससे यह मान लेना सही नहीं होगा कि भविष्य में किसी तरह का जोखिम पैदा नहीं हो सकता।
इस बार कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन की थीम “Resilience in an Age of Flux” यानी अनिश्चितता के दौर में सुदृढ़ता रखी गई है। सम्मेलन में वैश्विक आर्थिक झटकों, तकनीकी बदलाव, वित्तीय जोखिम और बदलते अंतरराष्ट्रीय माहौल से निपटने के तरीकों पर चर्चा हो रही है।
लंबे समय तक स्थिरता से बढ़ सकता है जोखिम
वित्तीय व्यवस्था में लंबे समय तक स्थिरता रहने पर आमतौर पर बाजार से जुड़े लोग और संस्थान ज्यादा जोखिम लेने की ओर बढ़ सकते हैं। इसी दौरान कर्ज का स्तर भी बढ़ सकता है।
ऐसे में मौजूदा समय में वित्तीय स्थिति मजबूत होने के बावजूद भविष्य में पैदा होने वाले जोखिमों पर लगातार नजर रखना जरूरी हो जाता है। वित्तीय स्थिरता सिर्फ मौजूदा हालात को देखने से नहीं, बल्कि संभावित जोखिमों की पहले से पहचान करने से भी जुड़ी है।
अगला वित्तीय संकट सिर्फ बैंक से नहीं आएगा
बदलते वैश्विक माहौल में वित्तीय संकट का कारण केवल बैंक या कोई बड़ी वित्तीय संस्था ही हो, यह जरूरी नहीं है। तकनीक पर बढ़ती निर्भरता के साथ जोखिमों का स्वरूप भी बदल रहा है।
भू-राजनीतिक घटनाएं, साइबर हमले, तकनीकी गड़बड़ियां और वैश्विक वित्तीय नेटवर्क में किसी तरह की बड़ी समस्या का असर कई क्षेत्रों तक पहुंच सकता है।
यही वजह है कि वित्तीय स्थिरता को अब सिर्फ बैंकिंग सिस्टम तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता।
भू-राजनीतिक घटनाएं बन सकती हैं चुनौती
दुनिया में होने वाली बड़ी भू-राजनीतिक घटनाओं का असर ऊर्जा कीमतों, व्यापार, सप्लाई चेन और वित्तीय बाजारों पर पड़ सकता है। कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन में भी वैश्विक झटकों, ऊर्जा जोखिमों, सप्लाई-चेन में रुकावट और आर्थिक अनिश्चितताओं को प्रमुख चर्चा के विषयों में शामिल किया गया है।
ऐसे घटनाक्रम का असर सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से निवेश, पूंजी प्रवाह और आर्थिक गतिविधियों पर पड़ सकता है।
साइबर अटैक और तकनीकी गड़बड़ी भी बड़ा जोखिम
डिजिटल पेमेंट और ऑनलाइन बैंकिंग के बढ़ते इस्तेमाल के साथ वित्तीय व्यवस्था तकनीक पर पहले से ज्यादा निर्भर हो गई है। ऐसे में किसी बड़े साइबर हमले या महत्वपूर्ण तकनीकी सिस्टम में गड़बड़ी का असर सिर्फ एक कंपनी तक सीमित नहीं रह सकता।
पेमेंट सिस्टम, बैंकिंग सेवाओं और दूसरी डिजिटल वित्तीय सेवाओं में लंबे समय तक रुकावट आने पर इसका व्यापक असर पड़ सकता है। इसलिए साइबर सुरक्षा और मजबूत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर भी वित्तीय स्थिरता का महत्वपूर्ण हिस्सा बनते जा रहे हैं।
सिर्फ बैंकों पर नजर रखना काफी नहीं
वित्तीय स्थिरता का दायरा बैंकिंग सिस्टम से कहीं ज्यादा बड़ा है। NBFC, शेयर बाजार, पेमेंट सिस्टम, टेक्नोलॉजी इंफ्रास्ट्रक्चर और महत्वपूर्ण थर्ड-पार्टी सर्विस प्रोवाइडर्स भी वित्तीय व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं।
आज एक वित्तीय संस्था की सेवाएं दूसरी संस्था के डिजिटल सिस्टम, टेक्नोलॉजी या पेमेंट नेटवर्क से जुड़ी हो सकती हैं। इसलिए किसी एक हिस्से में पैदा हुई समस्या दूसरे हिस्सों तक भी पहुंच सकती है।
दुनिया से जुड़ी वित्तीय व्यवस्था में बाहरी असर भी अहम
भारत की अर्थव्यवस्था वैश्विक व्यापार और वित्तीय बाजारों से जुड़ी हुई है। ऐसे में किसी दूसरे देश या अंतरराष्ट्रीय बाजार में पैदा होने वाली बड़ी वित्तीय समस्या का असर दूसरे देशों तक पहुंच सकता है।
इसी वजह से वैश्विक पूंजी प्रवाह, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय नेटवर्क और बाहरी आर्थिक झटकों पर नजर रखना भी जरूरी है।
मजबूत स्थिति का मतलब जोखिम खत्म होना नहीं
RBI गवर्नर की बात का प्रमुख संदेश यही है कि मौजूदा वित्तीय मजबूती को भविष्य के जोखिमों से सुरक्षा की गारंटी नहीं माना जाना चाहिए। केंद्रीय बैंकिंग की भूमिका में वित्तीय स्थिरता, पूंजी प्रवाह और वैश्विक झटकों के बीच जोखिमों को संभालना महत्वपूर्ण बना हुआ है। कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन का केंद्रीय फोकस भी बदलते वैश्विक माहौल में आर्थिक मजबूती और लचीलेपन पर है।
यानी भारतीय वित्तीय व्यवस्था के लिए चुनौती सिर्फ आज की स्थिति को मजबूत बनाए रखना नहीं है, बल्कि आने वाले समय में पैदा होने वाले साइबर, तकनीकी, भू-राजनीतिक और वित्तीय जोखिमों से निपटने की तैयारी भी बनाए रखना है।

