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भारतीयों की सेहत से खिलवाड़? Maggi, KitKat और Fanta के इंग्रिडिएंट्स पर खड़े हुए बड़े सवाल

भारतीयों की सेहत से खिलवाड़? Maggi, KitKat और Fanta के इंग्रिडिएंट्स पर खड़े हुए बड़े सवाल

अगर आप ब्रिटेन में Fanta की बोतल खरीदते हैं और फिर भारत में उसी ब्रांड की Fanta लेते हैं, तो नाम और पैकेजिंग भले ही लगभग एक जैसी दिखे, लेकिन दोनों देशों में बिकने वाले प्रोडक्ट की सामग्री अलग हो सकती है। Reuters की एक रिपोर्ट में भारत और ब्रिटेन में बिकने वाली Fanta की तुलना करते हुए चीनी की मात्रा और इस्तेमाल किए जाने वाले रंगों को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में बिकने वाली Fanta में ब्रिटेन के मुकाबले ज्यादा चीनी होती है। इसके अलावा कुछ ऐसे फूड कलर्स को लेकर भी सवाल उठे हैं, जिनके इस्तेमाल पर यूरोप में उपभोक्ताओं को प्रमुखता से जानकारी दी जाती है। भारत में ऐसी जानकारी आमतौर पर पैकेट के पीछे दी जाती है।

यह मामला सिर्फ Fanta तक सीमित नहीं है। भारत में पैकेज्ड फूड और ड्रिंक्स पर ज्यादा नमक, चीनी और फैट की जानकारी सामने की तरफ स्पष्ट रूप से देने की मांग लंबे समय से चल रही है। स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का कहना है कि इससे ग्राहक खरीदने से पहले आसानी से समझ सकेगा कि किसी प्रोडक्ट में क्या और कितनी मात्रा में मौजूद है।

करीब 20 देशों में लागू है Warning Label सिस्टम

दुनिया के करीब 20 देशों में पैकेज्ड फूड पर फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी व्यवस्था लागू है। कुछ देशों में लाल निशान के जरिए ज्यादा चीनी, नमक या फैट वाले प्रोडक्ट की जानकारी दी जाती है, जबकि कुछ जगह ट्रैफिक लाइट सिस्टम का इस्तेमाल होता है।

इसका उद्देश्य ग्राहकों को आसान और तुरंत समझ आने वाली जानकारी देना है। भारत में भी इस तरह के सिस्टम को लागू करने पर चर्चा होती रही है, लेकिन इसे लेकर फूड इंडस्ट्री और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच मतभेद हैं।

कंपनियों ने Warning Label का क्यों किया विरोध?

Reuters के मुताबिक, मार्च 2026 में हुई एक बैठक में कई बड़ी कंपनियों ने प्रस्तावित Warning Label का विरोध किया था। कंपनियों का तर्क था कि पैकेट पर कोई खास सिंबल लगाने से लोगों की खानपान की आदतों में जरूरी बदलाव नहीं आएगा।

कंपनियों ने Portion Control यानी कम मात्रा में खाने के प्रति लोगों को जागरूक करने को ज्यादा प्रभावी तरीका बताया। दूसरी तरफ स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का कहना है कि ग्राहकों को प्रोडक्ट खरीदने से पहले उसकी पोषण संबंधी जानकारी आसानी से समझ में आनी चाहिए।

अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की मांग है कि भारत में भी ज्यादा चीनी, नमक और फैट वाले प्रोडक्ट्स के पैकेट के सामने स्पष्ट चेतावनी दी जाए। अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार और FSSAI से जवाब मांगा है।

Fanta के अलावा KitKat, Maggi और Cerelac भी चर्चा में

भारत और दूसरे देशों में एक ही ब्रांड के प्रोडक्ट की रेसिपी अलग होने को लेकर भी लंबे समय से बहस होती रही है। कंपनियों का कहना है कि अलग-अलग देशों के नियम, ग्राहकों की पसंद और कीमतों के हिसाब से प्रोडक्ट के फॉर्मूले में बदलाव किए जाते हैं।

Food Pharmer के नाम से चर्चित फूड एक्टिविस्ट रेवंत हिमतसिंघका भी कई बार भारतीय और विदेशी बाजारों में बिकने वाले प्रोडक्ट्स की तुलना कर चुके हैं। Reuters की रिपोर्ट में Fanta के अलावा KitKat और Cerelac जैसे प्रोडक्ट्स का भी जिक्र किया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया में बिकने वाली KitKat में कोको की मात्रा भारतीय वेरिएंट से ज्यादा बताई गई है। वहीं भारत में बिकने वाली Maggi में पाम ऑयल के इस्तेमाल का जिक्र है, जबकि ब्रिटेन के कुछ वेरिएंट में सनफ्लावर ऑयल इस्तेमाल किया जाता है।

असली सवाल ग्राहक को मिलने वाली जानकारी का

इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल यह है कि ग्राहकों को प्रोडक्ट खरीदते समय उसके बारे में कितनी और कितनी आसानी से समझ आने वाली जानकारी मिलती है।

भारत में ज्यादातर पैकेज्ड फूड और ड्रिंक्स पर सामग्री और न्यूट्रिशन संबंधी जानकारी पैकेट के पीछे दी जाती है। स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का कहना है कि ग्राहक दुकान में खरीदारी करते समय अक्सर सामने दिखने वाली जानकारी पर ही ज्यादा ध्यान देता है। ऐसे में फ्रंट-ऑफ-पैक Warning Label उसे बेहतर फैसला लेने में मदद कर सकता है।

Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का पैकेज्ड फूड और बेवरेज बाजार 100 अरब डॉलर से ज्यादा का हो चुका है। उद्योग जगत के अनुमान के अनुसार, अगर रंग आधारित चेतावनी प्रणाली लागू होती है तो बड़ी संख्या में प्रोडक्ट्स पर चेतावनी दिखाई दे सकती है।

बढ़ते मोटापे के बीच बहस हुई अहम

इस मुद्दे की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि रिपोर्ट में Lancet की एक स्टडी का हवाला दिया गया है, जिसके मुताबिक 2050 तक भारत में करीब 45 करोड़ लोग ओवरवेट या मोटापे की समस्या से जूझ सकते हैं।

ऐसे में बहस सिर्फ Fanta में चीनी की मात्रा तक सीमित नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि क्या भारतीय उपभोक्ताओं को पैकेज्ड फूड खरीदते समय इतनी स्पष्ट जानकारी मिल रही है कि वे अपनी और अपने बच्चों की सेहत को ध्यान में रखकर सही फैसला ले सकें।

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