ईरान युद्ध से $35 ट्रिलियन की ‘सुपरपावर’ बनी, भारत और ब्रिटेन की संयुक्त अर्थव्यवस्था से भी बड़ी
दुनिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और युद्धों के बीच एक ऐसा आर्थिक परिदृश्य उभरकर सामने आया है, जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था के आकार और शक्ति संतुलन पर नई बहस छेड़ दी है। हाल ही में सामने आए एक विश्लेषण के मुताबिक, विभिन्न देशों के बढ़ते सैन्य खर्च और युद्ध से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों ने मिलकर लगभग 35 ट्रिलियन डॉलर की एक ‘सुपरपावर अर्थव्यवस्था’ तैयार कर दी है। यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि यह भारत और ब्रिटेन की कुल अर्थव्यवस्था से भी अधिक बताया जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया भर में जारी संघर्षों, खासकर मध्य पूर्व में ईरान से जुड़े तनाव, ने रक्षा उद्योग और सैन्य तकनीक से जुड़े कारोबार को अभूतपूर्व गति दी है। हथियारों के निर्माण, रक्षा उपकरणों की खरीद, सैन्य अनुसंधान और सुरक्षा सेवाओं में तेजी से निवेश बढ़ा है। इन सब गतिविधियों को जोड़कर देखें तो एक विशाल आर्थिक ढांचा बनता है, जिसे कई विश्लेषक “युद्ध अर्थव्यवस्था” या “सैन्य औद्योगिक कॉम्प्लेक्स” के रूप में देखते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर रक्षा और सुरक्षा से जुड़ा कारोबार लगातार बढ़ रहा है। कई देशों ने अपने सैन्य बजट में बड़े पैमाने पर वृद्धि की है। अमेरिका, चीन, रूस और यूरोपीय देशों के साथ-साथ मध्य पूर्व के कई देश भी अपने रक्षा खर्च को तेजी से बढ़ा रहे हैं। इस बढ़ते निवेश का बड़ा हिस्सा हथियार निर्माण कंपनियों, रक्षा तकनीक कंपनियों और निजी सुरक्षा कंपनियों के पास जा रहा है।
इसी बढ़ते रक्षा खर्च को आधार बनाकर किए गए एक आकलन में कहा गया है कि यदि दुनिया भर की सैन्य और युद्ध से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों को एक साथ जोड़ दिया जाए, तो इसकी कुल कीमत करीब 35 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच जाती है। यह आंकड़ा कई बड़े देशों की अर्थव्यवस्था से भी बड़ा है। तुलना करें तो भारत की अर्थव्यवस्था लगभग 3.7 ट्रिलियन डॉलर और ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था करीब 3.3 ट्रिलियन डॉलर के आसपास है। इस तरह दोनों देशों की संयुक्त अर्थव्यवस्था भी इस ‘युद्ध अर्थव्यवस्था’ से काफी छोटी मानी जा रही है।
युद्ध और तनाव भले ही मानवीय दृष्टि से गंभीर संकट पैदा करते हों, लेकिन इससे जुड़े उद्योगों के लिए यह बड़ा आर्थिक अवसर बन जाता है। रक्षा कंपनियों के शेयरों में तेजी, हथियारों की बढ़ती मांग और नई सैन्य तकनीकों के विकास से इस क्षेत्र की आर्थिक ताकत लगातार बढ़ रही है।
हालांकि कई अर्थशास्त्री इस प्रवृत्ति को चिंताजनक भी मानते हैं। उनका कहना है कि अगर इतनी बड़ी आर्थिक शक्ति युद्ध और हथियारों पर खर्च हो रही है, तो इसका मतलब है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास जैसे क्षेत्रों में उतना निवेश नहीं हो पा रहा। इससे वैश्विक असमानता भी बढ़ सकती है।
वैश्विक संघर्षों और बढ़ते रक्षा बजट ने एक ऐसी विशाल आर्थिक ताकत को जन्म दिया है, जिसे कई विश्लेषक 35 ट्रिलियन डॉलर की ‘सुपरपावर अर्थव्यवस्था’ कह रहे हैं। यह स्थिति न केवल दुनिया की आर्थिक संरचना को बदल रही है, बल्कि यह भी दिखाती है कि आधुनिक दौर में युद्ध केवल सैन्य शक्ति का नहीं बल्कि एक बड़े आर्थिक तंत्र का भी हिस्सा बन चुका है।

