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पेट्रोल में 20% एथेनॉल ब्लेंडिंग पर सरकार का बड़ा बयान, वीडियो में बोली- 'यह वैज्ञानिक प्रक्रिया है, गाड़ियों को नहीं होगा नुकसान'

पेट्रोल में 20% एथेनॉल ब्लेंडिंग पर सरकार का बड़ा बयान, वीडियो में बोली- 'यह वैज्ञानिक प्रक्रिया है, गाड़ियों को नहीं होगा नुकसान'

पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर चल रही बहस के बीच केंद्र सरकार ने शनिवार को स्पष्ट किया कि यह कोई जल्दबाजी में लिया गया फैसला नहीं है। सरकार का कहना है कि एथेनॉल मिश्रण एक वैज्ञानिक, चरणबद्ध और व्यापक परीक्षणों पर आधारित प्रक्रिया है, जिससे वाहनों को कोई बड़ा नुकसान नहीं होता। हालांकि, कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने इस कार्यक्रम को अभी भी प्रयोगात्मक (Experimental) बताया था।

सरकार ने क्या कहा?

दिल्ली में आयोजित इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स की प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरकार की ओर से शामिल विशेषज्ञ वर्तिका शुक्ला ने कहा कि एथेनॉल ब्लेंडिंग का कार्यक्रम वर्षों की रिसर्च और परीक्षण के बाद लागू किया गया है। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया रातों-रात शुरू नहीं हुई, बल्कि इसे स्टेप-बाय-स्टेप लागू किया गया है। इसके अलावा दुनिया के कई देशों में भी पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की व्यवस्था पहले से लागू है और शीर्ष वैज्ञानिक एवं तकनीकी एजेंसियों द्वारा इसका परीक्षण किया जा चुका है।

1.5% से बढ़कर 20% तक पहुंची ब्लेंडिंग

वर्तिका शुक्ला के अनुसार, वर्ष 2013-14 में भारत में पेट्रोल में केवल 1.5% एथेनॉल मिलाया जाता था। इसके बाद सरकार ने चरणबद्ध तरीके से इस प्रतिशत को बढ़ाया। उन्होंने बताया कि अब देश में 20% एथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य हासिल कर लिया गया है। यह लक्ष्य दिसंबर 2025 तक पूरा करने का था, लेकिन इसे तय समय से लगभग पांच साल पहले ही हासिल कर लिया गया।

सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने क्या कहा था?

दिलचस्प बात यह है कि चार दिन पहले केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने जवाब में कहा था कि 20% एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम अभी भी प्रयोगात्मक (Experimental) चरण में है।

सरकार ने अदालत को बताया था कि इस योजना के दीर्घकालिक प्रभावों का स्पष्ट आकलन अगले वर्ष तक ही हो सकेगा। यही वजह है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर बहस और सवाल लगातार बने हुए हैं।

एथेनॉल ब्लेंडिंग का उद्देश्य

सरकार का कहना है कि पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का मुख्य उद्देश्य—

  • कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना।
  • प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन में कमी लाना।
  • किसानों, विशेषकर गन्ना उत्पादकों को अतिरिक्त आय का स्रोत उपलब्ध कराना।
  • स्वच्छ और टिकाऊ ईंधन को बढ़ावा देना।

हालांकि, वाहन मालिकों और कुछ विशेषज्ञों की ओर से इंजन की क्षमता और दीर्घकालिक प्रभावों को लेकर चिंताएं भी जताई जाती रही हैं।

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