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खेत से बाजार तक बर्बाद हो रहा करोड़ों का खाना, देश में सिर्फ 4% फल-सब्जियों को मिलती है कोल्ड चेन की सुविधा; जानिए क्यों बढ़ रही है परेशानी

खेत से बाजार तक बर्बाद हो रहा करोड़ों का खाना, देश में सिर्फ 4% फल-सब्जियों को मिलती है कोल्ड चेन की सुविधा; जानिए क्यों बढ़ रही है परेशानी

भारत दुनिया के सबसे बड़े कृषि उत्पादक देशों में शामिल है। यहां हर साल बड़ी मात्रा में फल, सब्जियां और अनाज पैदा होते हैं, लेकिन इन उत्पादों को खेत से बाजार और फिर उपभोक्ताओं तक पहुंचाने के दौरान काफी नुकसान हो जाता है। इसकी बड़ी वजह पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज, रेफ्रिजरेटेड ट्रांसपोर्ट और आधुनिक सप्लाई चेन की कमी है। नतीजा यह है कि किसानों की मेहनत से उगाई गई उपज का एक हिस्सा बाजार तक पहुंचने से पहले ही खराब हो जाता है।

सितंबर 2026 में जारी ASSOCHAM-ASCELA की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में खराब होने वाले खाद्य उत्पादों में से केवल करीब 4 प्रतिशत ही संगठित कोल्ड चेन नेटवर्क के जरिए पहुंचते हैं। वहीं, अक्टूबर 2026 में प्रकाशित FICCI-Grant Thornton Bharat की रिपोर्ट ने भी बताया कि भारत में कोल्ड स्टोरेज की क्षमता बढ़ने के बावजूद खेत से गोदाम और गोदाम से बाजार तक की पूरी व्यवस्था अभी मजबूत नहीं है।इसका असर सिर्फ किसानों की कमाई पर नहीं पड़ता, बल्कि बाजार में फल-सब्जियों की उपलब्धता और कीमतों पर भी पड़ सकता है। आइए समझते हैं कि भारत में हर साल कितनी कृषि उपज बर्बाद होती है, कोल्ड स्टोरेज की कमी कहां है और सरकार इस समस्या से निपटने के लिए क्या कदम उठा रही है।

हर साल कितनी फल-सब्जियां हो जाती हैं खराब?

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय की ओर से NABARD Consultancy Services (NABCONS) के माध्यम से कराए गए अध्ययन में फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान का आकलन किया गया था। यह अध्ययन 2020-22 की अवधि के आंकड़ों पर आधारित है।

इस अध्ययन के मुताबिक:

  • फल: कुल उत्पादन का लगभग 6.02 से 15.05 प्रतिशत हिस्सा बर्बाद होता है।

  • सब्जियां: उत्पादन का लगभग 4.87 से 11.61 प्रतिशत हिस्सा खराब हो जाता है।

  • अनाज: फसल कटाई के बाद नुकसान का अनुमान 3.89 से 5.92 प्रतिशत के बीच है।

  • दालें: इनमें नुकसान का अनुमान 5.65 से 6.74 प्रतिशत तक है।

मंत्रालय के इसी अध्ययन के अनुसार, फलों का अनुमानित आर्थिक नुकसान करीब 29,545 करोड़ रुपये और सब्जियों का नुकसान करीब 27,459 करोड़ रुपये था। ये आंकड़े बताते हैं कि भंडारण और परिवहन की कमी से देश को कितना बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।

देश में कोल्ड स्टोरेज की क्षमता बढ़ी, फिर भी क्यों है परेशानी?

भारत में कोल्ड स्टोरेज की संख्या और क्षमता में पिछले कुछ वर्षों में बढ़ोतरी हुई है। FICCI और Grant Thornton Bharat की अक्टूबर 2026 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, जून 2025 तक देश में 8,815 कोल्ड स्टोरेज सुविधाएं थीं, जिनकी कुल क्षमता लगभग 4.022 करोड़ टन थी।

लेकिन समस्या सिर्फ गोदामों की संख्या की नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश की कोल्ड स्टोरेज क्षमता का बड़ा हिस्सा आलू के भंडारण में इस्तेमाल होता है। वहीं, फल-सब्जियों को खेत से ही ठंडा रखने, उनकी पैकिंग करने और रेफ्रिजरेटेड वाहनों से बाजार तक पहुंचाने वाली व्यवस्था पर्याप्त विकसित नहीं है।

यानी कोल्ड स्टोरेज मौजूद होने के बावजूद हर किसान के लिए अपनी उपज को सुरक्षित तरीके से वहां तक पहुंचाना आसान नहीं है।

खेत से बाजार तक किन वजहों से खराब होती है उपज?

फल और सब्जियां जल्दी खराब होने वाली चीजें हैं। इनकी सही तरीके से देखभाल नहीं की जाए तो कुछ ही समय में इनकी गुणवत्ता और कीमत दोनों प्रभावित हो सकती हैं।

1. खेतों के पास प्री-कूलिंग की कमी: फसल काटने के तुरंत बाद उसका तापमान कम करना जरूरी होता है। कई जगह ऐसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, जिससे उपज जल्दी खराब होने लगती है।

2. रेफ्रिजरेटेड वाहनों की कमी: सामान्य ट्रकों में फल-सब्जियों को लंबी दूरी तक ले जाने पर गर्मी और तापमान में बदलाव से नुकसान हो सकता है।

3. पर्याप्त पैकिंग और भंडारण नहीं: कई किसानों के पास आधुनिक पैक हाउस और सुरक्षित भंडारण की सुविधा नहीं होती। इससे फल-सब्जियां मंडियों तक पहुंचने से पहले ही खराब हो सकती हैं।

4. बाजार तक पहुंचने में देरी: परिवहन में देरी और सप्लाई चेन की कमजोर व्यवस्था के कारण जल्दी खराब होने वाली उपज का नुकसान बढ़ जाता है।

5. छोटे किसानों की आर्थिक परेशानी: छोटे किसानों के लिए महंगी कोल्ड स्टोरेज और परिवहन सुविधाओं का इस्तेमाल करना आसान नहीं होता। कई बार उन्हें मजबूरी में कम कीमत पर अपनी उपज बेचनी पड़ती है।

खाने की बर्बादी से आम लोगों पर क्या पड़ता है असर?

जब बाजार तक पहुंचने वाली फल-सब्जियों की मात्रा कम हो जाती है, तो मांग और आपूर्ति के बीच अंतर पैदा हो सकता है। खासकर किसी फसल के खराब होने या सप्लाई प्रभावित होने पर बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं।इसका असर आम परिवारों के मासिक बजट पर पड़ता है। टमाटर, प्याज, आलू और दूसरी रोजमर्रा की सब्जियों के दाम बढ़ने पर घर का राशन खर्च भी बढ़ जाता है।हालांकि, खाद्य महंगाई केवल कोल्ड स्टोरेज की कमी से तय नहीं होती। मौसम, बारिश, फसल उत्पादन, परिवहन लागत, ईंधन की कीमत और बाजार की मांग जैसे कई कारण भी कीमतों को प्रभावित करते हैं।

सरकार कोल्ड चेन और भंडारण के लिए क्या कर रही है?

केंद्र सरकार कृषि उपज की बर्बादी कम करने के लिए अलग-अलग योजनाओं के माध्यम से कोल्ड चेन और खाद्य प्रसंस्करण सुविधाओं को बढ़ावा दे रही है।इनमें प्रमुख रूप से प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना (PMKSY) के तहत इंटीग्रेटेड कोल्ड चेन और वैल्यू एडिशन इंफ्रास्ट्रक्चर योजना शामिल है। इसका उद्देश्य खेत से लेकर बाजार तक तापमान नियंत्रित सप्लाई चेन विकसित करना है।

इसके अलावा सरकार की ओर से खाद्य प्रसंस्करण, पैकिंग, भंडारण और परिवहन से जुड़ी सुविधाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय के दिसंबर 2025 के आंकड़ों के अनुसार, कोल्ड चेन परियोजनाओं के जरिए कृषि उत्पादों की शेल्फ लाइफ बढ़ाने और फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने का प्रयास किया जा रहा है। 

सिर्फ कोल्ड स्टोरेज बढ़ाना काफी नहीं, पूरी सप्लाई चेन मजबूत करनी होगी

भारत में कृषि उत्पादन की क्षमता काफी मजबूत है, लेकिन उत्पादन के बाद उपज को सुरक्षित रखने और बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था में अभी सुधार की जरूरत है। विशेषज्ञों की रिपोर्टों के मुताबिक, केवल बड़े-बड़े कोल्ड स्टोरेज बनाने से समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी।इसके लिए गांवों और खेतों के पास छोटे भंडारण केंद्र, प्री-कूलिंग यूनिट, आधुनिक पैक हाउस और रेफ्रिजरेटेड वाहन उपलब्ध कराने होंगे। साथ ही छोटे किसानों को इन सुविधाओं का इस्तेमाल सस्ती दरों पर करने का मौका देना होगा।अगर खेत से बाजार तक पूरी कोल्ड चेन मजबूत होती है, तो किसानों की उपज खराब होने से बच सकती है, उन्हें बेहतर कीमत मिल सकती है और उपभोक्ताओं तक भी फल-सब्जियां उचित दाम पर पहुंचने की संभावना बढ़ सकती है।

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