Delhi Heritage: कभी मुगल बेगम की सराय, फिर अंग्रेजों का संस्थान और बना नगर निगम मुख्यालय, जानें चांदनी चौक के टाउन हॉल की कहानी
पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक की पहचान सिर्फ बाजारों, ऐतिहासिक गलियों और मुगलकालीन इमारतों तक सीमित नहीं है। यहां मौजूद टाउन हॉल भी शहर के इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। कभी यह मुगल शहजादी जहांआरा बेगम की सराय हुआ करता था, फिर ब्रिटिश शासन के दौरान एक संस्थान बना और आजादी के बाद दिल्ली नगर निगम का मुख्यालय रहा। यह इमारत दिल्ली के बदलते राजनीतिक और प्रशासनिक इतिहास की गवाह है।
जहांआरा बेगम की सराय से शुरू हुआ इतिहास
17वीं सदी में इस जगह पर एक विशाल सराय हुआ करती थी, जिसे मुगल बादशाह शाहजहां की बेटी जहांआरा बेगम ने बनवाया था। यहां दूर-दराज से आने वाले व्यापारी और विदेशी यात्री ठहरते थे। सराय के परिसर में बगीचे और फव्वारे भी मौजूद थे।
1857 के विद्रोह के दौरान इस इमारत को काफी नुकसान पहुंचा। ब्रिटिश सेना ने दिल्ली पर दोबारा कब्जा करने के बाद पुराने ढांचे को गिरा दिया। इसके बाद अंग्रेजी प्रशासन ने इस जगह पर एक नए संस्थान के निर्माण की योजना बनाई।
1860 के दशक में ब्रिटिश वास्तुकार ई. जे. मार्टिन की देखरेख में नई इमारत का निर्माण शुरू हुआ। साल 1866 में यह बनकर तैयार हुई और इसे लॉरेंस इंस्टीट्यूट नाम दिया गया। इसका नाम तत्कालीन वायसराय जॉन लॉरेंस के नाम पर रखा गया था।
विक्टोरियन और यूरोपीय वास्तुकला का अनोखा मेल
टाउन हॉल की इमारत ईंट और पत्थर से बनी दो मंजिला संरचना है। इसकी वास्तुकला में विक्टोरियन और नवशास्त्रीय यूरोपीय शैली का मिश्रण देखने को मिलता है। पीले और सफेद रंग के बाहरी हिस्से में बड़े मेहराब और रोमन शैली के खंभे इसकी खूबसूरती बढ़ाते हैं।
इमारत के अंदर एक विशाल मुख्य हॉल, ऊंची छतें और लकड़ी का शानदार काम देखने को मिलता है। शुरुआत में यहां लाइब्रेरी, संग्रहालय और क्लब रूम जैसी सुविधाएं थीं। क्लब का इस्तेमाल मुख्य रूप से ब्रिटिश अधिकारियों और यूरोपीय निवासियों के लिए किया जाता था।
ब्रिटिश संस्थान से दिल्ली नगर निगम का मुख्यालय बना
भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान यह इमारत एक महत्वपूर्ण संस्थान के रूप में काम करती रही। बाद में दिल्ली नगर समिति ने इसे ब्रिटिश सरकार से 1,35,457 रुपये में खरीद लिया। इसके बाद इसे टाउन हॉल के नाम से जाना जाने लगा और यहां से शहर के नगर प्रशासन का कामकाज संचालित होने लगा।
आजादी के बाद अप्रैल 1958 में दिल्ली नगर निगम की स्थापना हुई। इसके बाद टाउन हॉल निगम का मुख्यालय बन गया। यहां होने वाली बैठकों में सफाई, पार्क, सार्वजनिक सुविधाओं और शहर के विकास से जुड़े फैसले लिए जाते थे।
कई दशकों तक यह इमारत दिल्ली की स्थानीय राजनीति और नगर प्रशासन का प्रमुख केंद्र बनी रही। साल 2009 तक यहां से निगम का कामकाज संचालित होता रहा। इसके बाद 2010 में नगर निगम के कर्मचारी और अधिकारी मिंटो रोड स्थित आधुनिक सिविक सेंटर में स्थानांतरित हो गए।
घंटाघर और महारानी विक्टोरिया की प्रतिमा की कहानी
टाउन हॉल के आसपास का इलाका भी कई ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रहा है। 1870 के दशक में चांदनी चौक की मुख्य सड़क पर इस इमारत के सामने करीब 130 फीट ऊंचा क्लॉक टावर बनाया गया था। इसे उत्तर भारत के प्रमुख और खूबसूरत घंटाघरों में गिना जाता था।
हालांकि, 1952 में इसका ऊपरी हिस्सा अचानक ढह गया। इस हादसे में कई लोगों की जान चली गई। इसके बाद सुरक्षा कारणों से बचे हुए ढांचे को भी हटा दिया गया। आज भी इस इलाके को घंटाघर के नाम से जाना जाता है।
टाउन हॉल के सामने कभी महारानी विक्टोरिया की कांसे की प्रतिमा भी स्थापित थी। इसे 1902 में लगाया गया था। बाद में भारतीय राष्ट्रवादी भावनाओं और विरोध के बीच आजादी के बाद 1940 में इसे हटा दिया गया। अब यह प्रतिमा नई दिल्ली के एक संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई है।
अब सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित करने की तैयारी
2010 में नगर निगम के कार्यालयों के स्थानांतरण के बाद टाउन हॉल कई वर्षों तक खाली पड़ा रहा। अब इस ऐतिहासिक इमारत को उसके पुराने स्वरूप में वापस लाने के लिए रेस्टोरेशन का काम किया जा रहा है।
इसके पुनर्विकास की योजनाओं में दिल्ली इतिहास संग्रहालय, डिजिटल लाइब्रेरी, क्राफ्ट बाजार और हेरिटेज बुटीक होटल या कैफेटेरिया जैसी सुविधाएं शामिल हैं। इसका उद्देश्य इस ऐतिहासिक परिसर को फिर से आम लोगों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनाना है।
चांदनी चौक का टाउन हॉल सिर्फ एक पुरानी इमारत नहीं है, बल्कि इसके भीतर मुगलकाल, ब्रिटिश शासन और आजाद भारत के प्रशासनिक बदलावों की कहानी छिपी है। आने वाले समय में सांस्कृतिक केंद्र के रूप में इसका विकास दिल्ली की विरासत को नई पहचान दे सकता है।

