Crude Oil Price Market Update: अमेरिका-ईरान तनाव से फिर बढ़ी तेल की कीमत, 100 डॉलर के करीब पहुंचा ब्रेंट; भारत पर क्या असर?
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब ग्लोबल क्रूड ऑयल मार्केट पर भी साफ दिखाई देने लगा है। मिडिल ईस्ट में सैन्य तनाव बढ़ने और तेल की सप्लाई बाधित होने की आशंका के बीच कच्चे तेल की कीमतों मं लगातार चौथे कारोबारी दिन तेजी दर्ज की गई। इंटरनेशनल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है।
बाजार में इस तेजी को लेकर सबसे बड़ी चिंता मिडिल ईस्ट से होने वाली तेल सप्लाई पर मंडरा रहा जोखिम है। अमेरिका और ईरान के बीच हालिया सैन्य कार्रवाई तथा क्षेत्र में बढ़ते तनाव ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है।
100 डॉलर के करीब क्यों पहुंचा ब्रेंट क्रूड?
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ने के बाद निवेशकों को आशंका है कि संघर्ष ज्यादा लंबा चल सकता है। ईरान की ओर से अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल हमलों और इसके बाद हुई जवाबी कार्रवाई ने बाजार में अनिश्चितता बढ़ा दी है।
इसके अलावा सऊदी अरब के कुछ एनर्जी इंस्टॉलेशन्स पर हूती हमलों की खबरों ने भी तेल की सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ाई है। यही वजह है कि निवेशक मिडिल ईस्ट की स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।
मंगलवार को ब्रेंट क्रूड करीब 98 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था और कुछ समय के लिए 100 डॉलर के बेहद करीब कारोबार करता नजर आया। अमेरिकी WTI क्रूड भी 93 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया। तेल की कीमतों में लगातार तेजी से महंगाई और ग्लोबल सप्लाई को लेकर जोखिम बढ़ गया है।
होर्मुज स्ट्रेट क्यों बना सबसे बड़ा चिंता का कारण?
मिडिल ईस्ट के मौजूदा संकट में होर्मुज स्ट्रेट सबसे महत्वपूर्ण बिंदुओं में से एक बन गया है। यह दुनिया के प्रमुख समुद्री तेल आपूर्ति मार्गों में शामिल है।
अगर इस रास्ते से तेल की आवाजाही में किसी बड़े स्तर पर रुकावट आती है तो ग्लोबल मार्केट में सप्लाई प्रभावित हो सकती है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में अचानक और तेज उछाल देखने को मिल सकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच जहाजों और तेल टैंकरों को लेकर हुई हालिया कार्रवाई के बाद बाजार में इस रूट की सुरक्षा को लेकर चिंता और बढ़ गई है।
भारत पर क्या पड़ेगा असर?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में लंबे समय तक क्रूड की कीमत ऊंची रहने पर देश के इंपोर्ट बिल पर सीधा दबाव पड़ सकता है।
महंगा कच्चा तेल रुपये पर भी दबाव बढ़ा सकता है। इसके अलावा पेट्रोल-डीजल, ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ने से महंगाई का असर अर्थव्यवस्था के दूसरे हिस्सों तक पहुंच सकता है।
अगर तेल की कीमत लंबे समय तक ऊंची रहती है तो सरकार, कंपनियों और आम उपभोक्ताओं—तीनों पर इसका असर देखने को मिल सकता है।
क्या 100 डॉलर के पार जा सकता है तेल?
कच्चे तेल की अगली दिशा काफी हद तक मिडिल ईस्ट के घटनाक्रम पर निर्भर करेगी। अगर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होता है और तेल की सप्लाई सामान्य बनी रहती है, तो कीमतों में कुछ राहत देखने को मिल सकती है।
वहीं, अगर संघर्ष लंबा खिंचता है और होर्मुज स्ट्रेट के जरिए तेल की सप्लाई प्रभावित होती है, तो ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर सकता है। लंबे समय तक सप्लाई में व्यवधान रहने की स्थिति मंै कीमतों में और तेज उछाल की आशंका भी बनी हुई है।
निवेशकों की नजर मिडिल ईस्ट पर
फिलहाल ग्लोबल मार्केट की नजर अमेरिका-ईरान तनाव, मिडिल ईस्ट में सैन्य गतिविधियों और तेल की सप्लाई पर टिकी है। जब तक क्षेत्र में तनाव कम नहीं होता, कच्चे तेल की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव बने रहने की संभावना है।
भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए यह स्थिति खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि क्रूड की कीमतों में बड़ा बदलाव देश की अर्थव्यवस्था, रुपये और महंगाई पर असर डाल सकता है।
डिस्क्लेमर: यह जानकारी केवल सूचना के उद्देश्य से दी गई है। कच्चे तेल और अन्य बाजारों में कीमतों में तेजी से बदलाव हो सकता है। निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। किसी भी निवेश संबंधी निर्णय से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से सलाह जरूर लें।

