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Bhavantar Yojana: मंडी में फसल का भाव गिरा तो किसानों को मिलेगा सहारा, सरकार करेगी नुकसान की भरपाई
 

Bhavantar Yojana: मंडी में फसल का भाव गिरा तो किसानों को मिलेगा सहारा, सरकार करेगी नुकसान की भरपाई

किसानों के लिए फसल तैयार करना जितना मेहनत भरा काम है, उतना ही मुश्किल कई बार उसे सही कीमत पर बेच पाना होता है। मौसम की अनिश्चितता, खाद-बीज और खेती की बढ़ती लागत के बाद जब मंडी में फसल के दाम अचानक गिर जाते हैं, तो किसान के सामने लागत निकालना भी चुनौती बन जाता है। अच्छी पैदावार के बावजूद बाजार भाव कम होने से होने वाले इसी नुकसान को कम करने के लिए मध्य प्रदेश सरकार की भावांतर भुगतान योजना अहम मानी जाती है।
यह योजना किसानों के लिए आर्थिक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है। जब किसान को अपनी उपज का निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP नहीं मिल पाता और बाजार में फसल कम कीमत पर बिकती है, तो सरकार तय नियमों के अनुसार भाव के अंतर की भरपाई करती है। इस रकम को सीधे किसान के बैंक खाते में DBT के जरिए ट्रांसफर किया जाता है।


कैसे काम करती है Bhavantar Yojana?
भावांतर योजना को एक उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है। मान लीजिए किसी फसल का MSP 4,000 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित है, लेकिन मंडी में आवक बढ़ने के कारण किसान की फसल सिर्फ 3,200 रुपये प्रति क्विंटल में बिकती है। ऐसे में MSP और बिक्री मूल्य के बीच 800 रुपये का अंतर बनता है।
योजना के नियमों के तहत पात्र किसान को इसी भाव अंतर के आधार पर आर्थिक सहायता मिल सकती है। यानी बाजार में कीमत गिरने से किसान पर पड़ने वाले नुकसान को सरकार की ओर से कम करने की कोशिश की जाती है।
इस व्यवस्था का एक फायदा यह भी है कि सरकार को हर बार किसानों की पूरी उपज खरीदकर उसका भंडारण नहीं करना पड़ता। वहीं किसान को भी बाजार में कम भाव मिलने की स्थिति में कुछ आर्थिक सुरक्षा मिलती है।


किन फसलों को योजना का लाभ मिल सकता है?
भावांतर भुगतान योजना के तहत मुख्य रूप से ऐसी फसलों को शामिल किया गया है, जिनके बाजार भाव में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है। इनमें सोयाबीन, मूंगफली, मक्का, मूंग, उड़द और कुछ तिलहन फसलें शामिल रही हैं। समय-समय पर योजना के दायरे में अन्य फसलों को भी जोड़ा जा सकता है।
किसानों के लिए बिक्री की अवधि भी निर्धारित की जाती है। पात्र किसान को तय सेलिंग विंडो के दौरान पंजीकृत कृषि उपज मंडी समिति में अपनी फसल बेचनी होती है। मंडी में बिक्री का रिकॉर्ड डिजिटल तरीके से दर्ज किया जाता है।


बिक्री के बाद कैसे मिलता है पैसा?
जब किसान अपनी फसल अधिकृत मंडी में बेचता है और व्यापारी की ओर से भुगतान किया जाता है, तो बिक्री से जुड़ी जानकारी डिजिटल सिस्टम में दर्ज होती है। इसके बाद निर्धारित प्रक्रिया के तहत मॉडल रेट और किसान को मिले वास्तविक बिक्री मूल्य के आधार पर भाव अंतर की गणना की जाती है।
पात्रता और अन्य निर्धारित शर्तें पूरी होने पर सहायता राशि DBT के माध्यम से सीधे किसान के बैंक खाते में भेजी जाती है। इससे भुगतान प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने की कोशिश की जाती है।


Registration के लिए किन बातों का रखें ध्यान?
योजना का लाभ लेने के लिए किसानों को संबंधित फसल और निर्धारित अवधि के अनुसार पंजीकरण कराना होता है। किसान ई-उपार्जन पोर्टल, कॉमन सर्विस सेंटर या लोक सेवा केंद्र के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं।
रजिस्ट्रेशन के दौरान आम तौर पर किसान से आधार से जुड़ी जानकारी, बैंक खाते की जानकारी, जमीन के दस्तावेज और सक्रिय मोबाइल नंबर जैसी जानकारियां मांगी जा सकती हैं। बैंक खाता आधार और NPCI से लिंक होना भी जरूरी है, ताकि DBT के जरिए मिलने वाली राशि में परेशानी न आए।
पंजीकरण के बाद खेती और जमीन से जुड़ी जानकारी का सत्यापन निर्धारित प्रक्रिया के तहत किया जाता है। सत्यापन पूरा होने के बाद किसान को पंजीकरण से संबंधित रसीद या प्रमाण मिल सकता है। इसके बाद तय अवधि में मंडी में फसल बेचने पर बिक्री रिकॉर्ड के आधार पर योजना का लाभ प्रक्रिया में लिया जाता है।
ध्यान दें: भावांतर भुगतान योजना में फसल, बिक्री अवधि, पात्रता, मॉडल रेट और भुगतान के नियम सरकार की ओर से समय-समय पर निर्धारित किए जा सकते हैं। इसलिए आवेदन या बिक्री से पहले संबंधित सरकारी पोर्टल अथवा कृषि विभाग की ताजा जानकारी जरूर जांचें।
 

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