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1 जुलाई से बदल गए 8 बड़े नियम: गैस सिलेंडर हुआ सस्ता, पासपोर्ट महंगा, वीडियो में जाने ट्रेन में बिना टिकट सफर पर भारी जुर्माना

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गुजरात हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह की वैधता को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि सिर्फ मैरिज सर्टिफिकेट जारी हो जाने से किसी हिंदू विवाह को कानूनी रूप से वैध नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि विवाह तभी मान्य होगा, जब हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 के तहत निर्धारित आवश्यक धार्मिक रीति-रिवाज पूरे किए गए हों।जस्टिस इलेश जे. वोरा और जस्टिस आर.टी. वच्छानी की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि जिन समुदायों में सात फेरे विवाह की अनिवार्य परंपरा हैं, वहां इनके बिना शादी को पूर्ण और वैध नहीं माना जा सकता।

'मैरिज सर्टिफिकेट केवल रिकॉर्ड, विवाह का प्रमाण नहीं'

हाईकोर्ट ने कहा कि मैरिज सर्टिफिकेट का उद्देश्य पहले से संपन्न विवाह का रिकॉर्ड तैयार करना होता है। यह दस्तावेज अपने आप किसी विवाह को कानूनी मान्यता नहीं देता। यदि विवाह कानून के अनुसार निर्धारित धार्मिक या पारंपरिक रस्मों के बिना किया गया है, तो केवल प्रमाणपत्र के आधार पर उसे वैध नहीं माना जा सकता।

ब्रिटेन में रहने वाले व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई

यह मामला ब्रिटेन में रहने वाले एक व्यक्ति की अपील से जुड़ा है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि अहमदाबाद की एक महिला ने उसे नौकरी दिलाने का झांसा देकर कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवा लिए और बाद में उन्हीं दस्तावेजों के आधार पर फर्जी तरीके से मैरिज सर्टिफिकेट बनवा लिया। याचिकाकर्ता का कहना है कि दोनों के बीच कभी हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह हुआ ही नहीं, इसलिए मैरिज सर्टिफिकेट को वैध विवाह का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

फैसले का क्या है महत्व?

हाईकोर्ट की टिप्पणी ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जहां विवाह के वास्तविक आयोजन पर विवाद हो और केवल मैरिज सर्टिफिकेट के आधार पर वैवाहिक संबंध का दावा किया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह की वैधता के लिए केवल पंजीकरण पर्याप्त नहीं है, बल्कि संबंधित समुदाय की परंपराओं और हिंदू मैरिज एक्ट में निर्धारित आवश्यक वैवाहिक रस्मों का पालन भी जरूरी है।

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