EV Pollution: इलेक्ट्रिक गाड़ियां भी फैलाती हैं प्रदूषण! बैटरी से लेकर चार्जिंग तक जानें पर्यावरण पर कितना पड़ता है असर
इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) को पेट्रोल-डीजल गाड़ियों का बेहतर विकल्प माना जाता है. इन गाड़ियों से सीधे तौर पर धुआं नहीं निकलता, इसलिए इन्हें शहरों में बढ़ते वायु प्रदूषण को कम करने का प्रभावी तरीका बताया जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इलेक्ट्रिक गाड़ियों के निर्माण से लेकर उन्हें चार्ज करने और चलाने तक कई प्रक्रियाओं में प्रदूषण होता है? हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ईवी पेट्रोल-डीजल वाहनों जितना प्रदूषण फैलाती हैं. आइए समझते हैं कि इलेक्ट्रिक गाड़ियों से पर्यावरण पर किस तरह असर पड़ता है.
बिजली उत्पादन से भी निकलता है कार्बन
इलेक्ट्रिक कार और स्कूटर में पेट्रोल-डीजल नहीं जलता, लेकिन इन्हें चलाने के लिए बिजली की जरूरत होती है. भारत में बिजली उत्पादन का बड़ा हिस्सा कोयले पर निर्भर है. कोयला आधारित बिजली संयंत्रों से बिजली बनाने के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड और दूसरे प्रदूषक निकलते हैं.
ऐसे में जब कोई व्यक्ति अपनी ईवी चार्ज करता है, तो उससे जुड़ा कार्बन उत्सर्जन पूरी तरह खत्म नहीं होता. हालांकि, सौर और पवन ऊर्जा जैसे स्वच्छ स्रोतों से मिलने वाली बिजली ईवी के पर्यावरणीय फायदे को और बढ़ा सकती है.
बैटरी बनाने में होता है ज्यादा संसाधनों का इस्तेमाल
इलेक्ट्रिक वाहन की बैटरी उसके सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक है. इसे बनाने के लिए लिथियम, निकेल, कोबाल्ट और ग्रेफाइट जैसे खनिजों की जरूरत होती है. इन खनिजों के खनन, प्रसंस्करण और बैटरी निर्माण में बड़ी मात्रा में ऊर्जा और पानी खर्च होता है.
इस पूरी प्रक्रिया के दौरान कार्बन उत्सर्जन होता है. साथ ही खनन गतिविधियों से आसपास के पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों पर भी असर पड़ सकता है. यही वजह है कि ईवी के निर्माण के शुरुआती चरण में इनका कार्बन फुटप्रिंट अधिक हो सकता है.
टायर और ब्रेक से भी निकलते हैं प्रदूषक कण
इलेक्ट्रिक वाहनों से एग्जॉस्ट धुआं नहीं निकलता, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनसे किसी तरह का वायु प्रदूषण नहीं होता. पेट्रोल-डीजल और इलेक्ट्रिक दोनों तरह की गाड़ियों के टायर सड़क पर घिसते हैं, जिससे छोटे-छोटे कण निकलकर हवा में फैलते हैं.
ब्रेक लगाने के दौरान भी ब्रेक पैड और डिस्क के घिसने से कण पैदा होते हैं. हालांकि, ईवी में रीजेनरेटिव ब्रेकिंग तकनीक के कारण सामान्य ब्रेक का इस्तेमाल कम होता है, जिससे ब्रेक से निकलने वाले कणों में कमी आ सकती है.
पुरानी बैटरी का सही निपटान जरूरी
इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी समय के साथ अपनी क्षमता खोने लगती है. एक निश्चित अवधि के बाद इसे बदलने या रीसाइक्लिंग की जरूरत पड़ती है. यदि पुरानी बैटरी को बिना उचित प्रक्रिया के फेंक दिया जाए या तोड़ा जाए, तो उसमें मौजूद रासायनिक पदार्थ मिट्टी और पानी को नुकसान पहुंचा सकते हैं.
इस समस्या से बचने के लिए बैटरी का सुरक्षित निपटान और रीसाइक्लिंग बेहद जरूरी है. सही तरीके से रीसाइक्लिंग करने पर बैटरी में मौजूद कई उपयोगी खनिजों को दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है.
क्या पेट्रोल-डीजल गाड़ियों से बेहतर हैं इलेक्ट्रिक वाहन?
ईवी से प्रदूषण के अलग-अलग स्रोत जरूर हैं, लेकिन पूरे जीवनकाल के उत्सर्जन को देखें तो इलेक्ट्रिक वाहन आमतौर पर पेट्रोल-डीजल गाड़ियों की तुलना में कम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित करते हैं. इसका वास्तविक फायदा इस बात पर भी निर्भर करता है कि बिजली किस स्रोत से बनाई जा रही है, बैटरी कैसे तैयार हुई है और वाहन का इस्तेमाल कितना किया जाता है.
यानी इलेक्ट्रिक गाड़ियां पूरी तरह प्रदूषण मुक्त नहीं हैं, लेकिन स्वच्छ ऊर्जा, बेहतर बैटरी तकनीक और प्रभावी रीसाइक्लिंग के साथ ये परिवहन को ज्यादा पर्यावरण अनुकूल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं.

