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अधिकमास में क्यों खास है मालपुए का भोग? जानिए पुरुषोत्तम मास में दान-पुण्य का महत्व

अधिकमास में क्यों खास है मालपुए का भोग? जानिए पुरुषोत्तम मास में दान-पुण्य का महत्व

हिंदू पंचांग के अनुसार अधिकमास, जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है, एक अत्यंत पवित्र और दुर्लभ समय माना जाता है। यह मास लगभग हर तीन साल में एक बार आता है और इसे धर्म-कर्म, पूजा-पाठ और दान-पुण्य के लिए बेहद शुभ माना गया है। इस दौरान भगवान श्रीहरि विष्णु की विशेष उपासना का विधान बताया गया है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अधिकमास में किए गए जप, तप और दान का फल सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक मिलता है। इसी वजह से भक्त इस पूरे माह में संयम, भक्ति और सेवा भाव के साथ धार्मिक कार्यों में शामिल होते हैं।

इस मास में भगवान विष्णु को मालपुए का भोग लगाने और उन्हें दान करने की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है। कहा जाता है कि मालपुआ एक मीठा और सात्विक व्यंजन है, जो प्रसन्नता, समर्पण और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। भक्त इसे भगवान को अर्पित करके अपने जीवन में सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।

मान्यताओं के अनुसार, अधिकमास में श्रीहरि विष्णु को मालपुए का भोग लगाने के बाद उसे ब्राह्मणों, जरूरतमंदों या गरीबों में दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। ऐसा करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है और पापों के नाश का विश्वास भी जुड़ा हुआ है।

धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में यह भी बताया गया है कि अधिकमास स्वयं भगवान विष्णु को समर्पित माना गया है, इसलिए इस समय किया गया हर अच्छा कर्म सीधे श्रीहरि की कृपा से जुड़ जाता है। यही कारण है कि इस मास में लोग विशेष पूजा, व्रत और दान पर अधिक ध्यान देते हैं।

Hinduism में अधिकमास को आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का अवसर माना गया है। यह समय व्यक्ति को अपने जीवन में संयम, सेवा और भक्ति की भावना को मजबूत करने का संदेश देता है।

आज के समय में भी यह परंपरा कई स्थानों पर श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। लोग मंदिरों में प्रसाद चढ़ाते हैं और जरूरतमंदों की सहायता करते हैं, जिससे सामाजिक सहयोग और मानवता की भावना को भी बढ़ावा मिलता है।

कुल मिलाकर, अधिकमास केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समय नहीं है, बल्कि यह जीवन में सकारात्मकता, दान और आध्यात्मिक जागरूकता को बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है।

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