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नवरात्रि में क्यों खास हैं संधि पूजा के 48 मिनट? जानें अष्टमी-नवमी के संधिकाल का महत्व
 

नवरात्रि में क्यों खास हैं संधि पूजा के 48 मिनट? जानें अष्टमी-नवमी के संधिकाल का महत्व

शारदीय नवरात्रि में महाष्टमी और महानवमी के बीच का समय संधिकाल कहलाता है। इस अवधि में की जाने वाली पूजा को संधि पूजा कहते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह समय मां दुर्गा के चामुंडा स्वरूप की आराधना के लिए विशेष होता है।

संधि पूजा के 48 मिनट कैसे तय होते हैं?

संधि पूजा में अष्टमी तिथि के अंतिम 24 मिनट और नवमी तिथि के शुरुआती 24 मिनट शामिल होते हैं। दोनों अवधियों को मिलाकर कुल 48 मिनट का संधिकाल बनता है। इसे दो घटी की अवधि भी कहा जाता है।

इस साल 2026 में संधि पूजा का समय 19 अक्टूबर, सोमवार को सुबह 10:27 बजे से 11:15 बजे तक बताया गया है। यह मुहूर्त अष्टमी तिथि के सुबह 10:51 बजे समाप्त होने के समय के आधार पर निर्धारित किया गया है।

संधि पूजा का मां चामुंडा से क्या संबंध है?

पौराणिक मान्यता के अनुसार, देवी दुर्गा ने चंड और मुंड नामक असुरों का वध करने के लिए उग्र स्वरूप धारण किया था। इसी स्वरूप को मां चामुंडा के नाम से जाना जाता है। संधि पूजा को इसी प्रसंग से जोड़कर देखा जाता है।

इसलिए भक्त इस समय देवी की शक्ति का स्मरण करते हैं और बुराई पर अच्छाई की विजय की कामना करते हैं।

संधि पूजा में क्या करें?

संधिकाल शुरू होने से पहले पूजा की सामग्री तैयार कर लें, ताकि 48 मिनट के दौरान पूजा पर ध्यान केंद्रित किया जा सके।

  • मां दुर्गा या मां चामुंडा का ध्यान करें।

  • लाल फूल, रोली, अक्षत और धूप-दीप अर्पित करें।

  • अपनी परंपरा के अनुसार दीपक जलाएं।

  • दुर्गा सप्तशती के चंड-मुंड वध प्रसंग का पाठ कर सकते हैं।

  • मां के मंत्र का जाप करके आरती करें।

कुछ परंपराओं में 108 दीपक और 108 कमल के फूल अर्पित करने की विशेष प्रथा है। यह हर जगह अनिवार्य नहीं है; श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य और स्थानीय परंपरा के अनुसार पूजा कर सकते हैं।

संधि पूजा का मंत्र

मां चामुंडा की आराधना के लिए इस मंत्र का जाप किया जा सकता है:

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥

धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रद्धा के साथ मंत्र जाप करने से भक्तों को मानसिक शांति और साहस की अनुभूति होती है।

संधि पूजा करते समय इन बातों का रखें ध्यान

संधि पूजा का समय तिथि परिवर्तन के आधार पर तय होता है, इसलिए इसे अपनी सुविधा से किसी दूसरे समय पर करना पारंपरिक संधिकाल की पूजा के समान नहीं माना जाता। पूजा के लिए पहले से तैयारी करें और अपने शहर के पंचांग या मंदिर द्वारा बताए गए मुहूर्त की पुष्टि कर लें।

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