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कौन था युयुत्सु? महाभारत का वह योद्धा जिसने धर्म के लिए छोड़ दिया था कौरवों का साथ

कौन था युयुत्सु? महाभारत का वह योद्धा जिसने धर्म के लिए छोड़ दिया था कौरवों का साथ

महाभारत में कई ऐसे पात्र हैं, जिनकी भूमिका भले ही कम दिखाई देती हो, लेकिन उनके निर्णय इतिहास में अमर हो गए। ऐसा ही एक नाम है युयुत्सु का। बहुत कम लोग जानते हैं कि महाभारत युद्ध के बाद कौरव वंश का अंतिम संस्कार करने वाला व्यक्ति युयुत्सु ही था।

युयुत्सु को कौरवों में सबसे धर्मप्रिय और न्यायवादी माना जाता है। उसने अपने परिवार से ऊपर उठकर सत्य और धर्म का साथ चुना था। यही कारण है कि महाभारत में उसका चरित्र विशेष महत्व रखता है।

धृतराष्ट्र का पुत्र था युयुत्सु

महाभारत के अनुसार युयुत्सु राजा धृतराष्ट्र का पुत्र था, लेकिन उसकी माता गांधारी नहीं थीं। कहा जाता है कि उसका जन्म धृतराष्ट्र और एक वैश्य दासी के संबंध से हुआ था। इसी वजह से उसे राजपरिवार में वह सम्मान नहीं मिला, जो अन्य कौरवों को प्राप्त था। हालांकि युयुत्सु स्वभाव से शांत, बुद्धिमान और धर्म का पालन करने वाला माना जाता था। उसे बचपन से ही सही और गलत की अच्छी समझ थी।

युद्ध से पहले चुना धर्म का मार्ग

जब कुरुक्षेत्र का युद्ध शुरू होने वाला था, तब दोनों पक्षों को अंतिम अवसर दिया गया कि यदि कोई योद्धा पक्ष बदलना चाहता है, तो वह ऐसा कर सकता है। उस समय युयुत्सु ने कौरवों का साथ छोड़कर पांडवों की ओर से युद्ध लड़ने का फैसला किया।

कहा जाता है कि वह दुर्योधन के अन्याय, छल और अधर्म से पहले ही असहमत था। उसने समझ लिया था कि धर्म पांडवों के साथ है, इसलिए उसने सत्य का साथ चुना।

युयुत्सु का यह निर्णय बेहद साहसी माना जाता है, क्योंकि उसने अपने ही भाइयों के खिलाफ खड़े होने का जोखिम उठाया था।

युद्ध के बाद निभाई सबसे बड़ी जिम्मेदारी

महाभारत युद्ध में कौरव पक्ष के लगभग सभी योद्धा मारे गए थे। दुर्योधन समेत धृतराष्ट्र के 100 पुत्रों का अंत हो गया। युद्ध समाप्त होने के बाद कौरव वंश में अंतिम संस्कार करने वाला कोई नहीं बचा था।

ऐसे समय में युयुत्सु ने आगे बढ़कर अपने भाइयों और कौरव कुल के योद्धाओं का अंतिम संस्कार किया। यही कारण है कि उसे कौरव वंश का अंतिम प्रतिनिधि भी माना जाता है।

धर्म और सत्य का प्रतीक है युयुत्सु

महाभारत में युयुत्सु का चरित्र यह संदेश देता है कि व्यक्ति को हमेशा सत्य और धर्म का साथ देना चाहिए, चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों।

धार्मिक विद्वानों के अनुसार युयुत्सु इस बात का उदाहरण है कि महानता जन्म से नहीं, बल्कि कर्मों से तय होती है। उसने साबित किया कि सही मार्ग चुनने वाला व्यक्ति ही सच्चा वीर कहलाता है।

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