पितृपक्ष यानी श्राद्ध पक्ष हिंदू धर्म में पूर्वजों के स्मरण और उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने का महत्वपूर्ण समय माना जाता है। इस दौरान परिवार के लोग अपनी परंपरा के अनुसार तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म करते हैं। साल 2026 में पितृपक्ष को लेकर 26 और 27 सितंबर की तारीख की चर्चा है, क्योंकि पूर्णिमा श्राद्ध 26 सितंबर को होगा, जबकि आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा 27 सितंबर से शुरू होगी। इस तरह मुख्य श्राद्ध पक्ष 27 सितंबर से माना जा रहा है और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ इसका समापन होगा।
पितृपक्ष में कौए को क्यों खिलाया जाता है?
श्राद्ध के दौरान कौए के लिए भोजन निकालने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। धार्मिक मान्यताओं में कौए को पितरों का प्रतीक और यमराज का संदेशवाहक माना गया है। ऐसी मान्यता है कि श्राद्ध का भोजन कौए के माध्यम से पितरों तक पहुंचता है और उन्हें तृप्ति मिलती है।
इसी वजह से श्राद्ध कर्म के बाद भोजन का एक हिस्सा कौए के लिए अलग निकालने की परंपरा है। इसे काकबलि कहा जाता है। कई परिवारों में कौए के साथ गाय, कुत्ते और चींटियों के लिए भी भोजन निकाला जाता है। इसे पंचबलि की परंपरा से जोड़ा जाता है।
कौआ न आए तो क्या करें?
धार्मिक मान्यताओं में कौए के भोजन ग्रहण करने को शुभ संकेत माना जाता है, लेकिन अगर कौआ तुरंत भोजन खाने न आए तो इसे लेकर चिंता करने की जरूरत नहीं है। श्राद्ध कर्म की श्रद्धा और विधि को अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसी स्थिति में भोजन किसी अन्य जीव को खिलाया जा सकता है या परिवार की परंपरा के अनुसार आगे की प्रक्रिया पूरी की जा सकती है।
पितृपक्ष में क्या-क्या किया जाता है?
पितृपक्ष में पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध किया जाता है। इसके अलावा तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराना और दान-पुण्य करने की परंपरा है। श्राद्ध के दौरान पंचबलि में गाय, कौए, कुत्ते, देवताओं और चींटियों के लिए भोजन निकालने की परंपरा भी कई परिवारों में प्रचलित है।

