Tulsi Vivah Date: नवंबर में तुलसी विवाह कब है? जानें आसान विधि, शुभ मुहूर्त और इसका महत्व
दिवाली के बाद कार्तिक महीने में तुलसी विवाह का विशेष धार्मिक महत्व होता है। हिंदू धर्म में इस दिन माता तुलसी और भगवान शालिग्राम का विवाह कराया जाता है। मान्यता है कि तुलसी विवाह कराने से घर में सुख-समृद्धि आती है और वैवाहिक जीवन में खुशहाली बनी रहती है। साल 2026 में तुलसी विवाह 21 नवंबर, शनिवार को मनाया जाएगा। यह पर्व देवउठनी एकादशी के अगले दिन यानी कार्तिक शुक्ल द्वादशी को मनाया जाता है।
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तुलसी विवाह 2026 कब है?
हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि 21 नवंबर 2026 को सुबह करीब 6 बजकर 31 मिनट से शुरू होगी और 22 नवंबर को सुबह करीब 4 बजकर 57 मिनट तक रहेगी।
उदयातिथि और प्रदोष काल के आधार पर इस साल तुलसी विवाह 21 नवंबर को किया जाएगा। हालांकि, कई परिवारों में देवउठनी एकादशी यानी 20 नवंबर को ही तुलसी विवाह कराने की परंपरा है। इसलिए अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार पूजा करना उचित रहेगा।
तुलसी विवाह 2026 शुभ मुहूर्त
जयपुर में 21 नवंबर को तुलसी विवाह के लिए प्रदोष काल का समय शाम 5 बजकर 34 मिनट से रात 8 बजकर 14 मिनट तक रहेगा।
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तुलसी विवाह की तारीख: 21 नवंबर 2026, शनिवार
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द्वादशी तिथि प्रारंभ: सुबह 6:31 बजे
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द्वादशी तिथि समाप्त: 22 नवंबर सुबह 4:57 बजे
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प्रदोष काल: शाम 5:34 से रात 8:14 बजे तक
धार्मिक मान्यता के अनुसार, प्रदोष काल में तुलसी और शालिग्राम का विवाह कराना शुभ माना जाता है।
तुलसी विवाह की पूजा सामग्री
तुलसी विवाह कराने के लिए कुछ जरूरी सामग्री पहले से तैयार कर लें।
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तुलसी का पौधा और गमला
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भगवान शालिग्राम या भगवान विष्णु की प्रतिमा
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लाल चुनरी और साड़ी
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फूल और माला
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रोली, हल्दी और अक्षत
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धूप, दीप और कपूर
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फल, मिठाई और पंचामृत
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गन्ना और मंडप सजाने की सामग्री
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पूजा के लिए कलावा और सिंदूर
तुलसी विवाह की आसान पूजा विधि
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सबसे पहले घर और तुलसी के पौधे के आसपास साफ-सफाई करें।
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तुलसी के गमले को अच्छी तरह सजाएं और उसके चारों ओर गन्ने से मंडप बनाएं।
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तुलसी माता को लाल चुनरी या साड़ी पहनाएं और उनका श्रृंगार करें।
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भगवान शालिग्राम को पीले वस्त्र पहनाकर तुलसी के पास स्थापित करें।
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दोनों को फूल, माला, रोली, अक्षत और फल अर्पित करें।
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तुलसी माता और भगवान शालिग्राम का विवाह पारंपरिक रीति-रिवाज से कराएं।
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विवाह के दौरान मंगल गीत गाएं और तुलसी-शालिग्राम की परिक्रमा करें।
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अंत में आरती करके प्रसाद वितरित करें।
तुलसी विवाह का धार्मिक महत्व क्या है?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता तुलसी को वृंदा का स्वरूप माना जाता है। भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया था कि वे सदैव उनके प्रिय रहेंगी। इसी मान्यता के आधार पर कार्तिक शुक्ल द्वादशी को तुलसी और भगवान शालिग्राम के विवाह का आयोजन किया जाता है।
कहा जाता है कि तुलसी विवाह कराने से कन्यादान के समान पुण्य प्राप्त होता है। जिन लोगों के विवाह में बाधाएं आ रही हैं, वे भी श्रद्धा के साथ तुलसी विवाह में शामिल होते हैं।
देवउठनी एकादशी के बाद शुरू होते हैं मांगलिक कार्य
देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु के योग निद्रा से जागने के साथ ही चातुर्मास समाप्त हो जाता है। इसके बाद हिंदू धर्म में विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है। तुलसी विवाह को भी इसी परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। इस दिन के बाद विवाह के शुभ मुहूर्त शुरू होने की मान्यता है।

