एक समय की बात है, राजा सुरथ नाम के एक धर्मात्मा राजा थे। शत्रुओं और अपने ही मंत्रियों के षड्यंत्र के कारण उनका राज्य उनसे छिन गया। दुखी होकर राजा वन में चले गए। वहां उनकी मुलाकात समाधि नाम के एक वैश्य से हुई। समाधि को उसके परिवार ने ही धोखा देकर घर से निकाल दिया था।
राजा सुरथ और समाधि दोनों अपने जीवन की परेशानियों से दुखी थे। वे ऋषि मेधा के आश्रम पहुंचे और उनसे पूछा कि जिन लोगों ने उन्हें दुख दिया, उनके प्रति भी उनका मन इतना मोह क्यों रखता है।
ऋषि मेधा ने उन्हें समझाया कि यह सब देवी महामाया की शक्ति है। यही आदिशक्ति संसार को मोह और माया में बांधती हैं तथा अपनी कृपा से भक्तों को मुक्ति और ज्ञान प्रदान करती हैं।
ऋषि की बात सुनकर राजा सुरथ और समाधि वैश्य ने मां भगवती की आराधना करने का संकल्प लिया। दोनों ने नदी के तट पर देवी की प्रतिमा स्थापित की और श्रद्धा के साथ पूजा, जप और तपस्या करने लगे।
कई दिनों तक कठोर साधना करने के बाद मां दुर्गा उनकी भक्ति से प्रसन्न हुईं और उनके सामने प्रकट हुईं। देवी ने दोनों को वरदान मांगने के लिए कहा।
राजा सुरथ ने अपना खोया हुआ राज्य वापस पाने और भविष्य में स्थायी राज्य की कामना की। वहीं समाधि वैश्य ने सांसारिक मोह से मुक्ति और आत्मज्ञान का वरदान मांगा।
मां दुर्गा ने दोनों की मनोकामना पूरी होने का आशीर्वाद दिया। धार्मिक मान्यता के अनुसार देवी की कृपा से राजा सुरथ को उनका राज्य वापस मिला, जबकि समाधि को ज्ञान और वैराग्य की प्राप्ति हुई।
कथा का संदेश
नवरात्रि व्रत कथा हमें बताती है कि सच्ची श्रद्धा, भक्ति और तपस्या से मां भगवती की कृपा प्राप्त की जा सकती है। देवी अपने भक्तों की मनोकामना पूरी करने के साथ उन्हें सही मार्ग और आत्मज्ञान भी प्रदान करती हैं। नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा के साथ व्रत कथा पढ़ने और सुनने की परंपरा है।
जय माता दी।

