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श्री गणपति द्वादश नाम स्तोत्रम्: गणेश जी के 12 नामों का पाठ, जानें हिंदी अर्थ और महत्व

श्री गणपति द्वादश नाम स्तोत्रम्: गणेश जी के 12 नामों का पाठ, जानें हिंदी अर्थ और महत्व

भगवान गणेश को हिंदू धर्म में प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता कहा जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत गणेश जी की पूजा और स्मरण से करने की परंपरा है। श्री गणेश अष्टकम् भगवान गणेश की महिमा का वर्णन करने वाला महत्वपूर्ण स्तोत्र है, जिसका संबंध गणेश पुराण के उपासना खंड से बताया जाता है। इसमें भगवान गणेश को सृष्टि के मूल कारण, अनंत शक्ति के स्वरूप और विघ्नों का नाश करने वाले देवता के रूप में नमन किया गया है। 

श्री गणेश अष्टकम् का पाठ

॥ श्री गणेशाष्टकम् ॥

सर्वे ऊचुः।

यतोऽनन्तशक्तेरनन्ताश्च जीवा
यतो निर्गुणादप्रमेया गुणास्ते।
यतो भाति सर्वं त्रिधा भेदभिन्नं
सदा तं गणेशं नमामो भजामः॥१॥

यतश्चाविरासीज्जगत्सर्वमेतत्
तथाऽब्जासनो विश्वगो विश्वगोप्ता।
तथेन्द्रादयो देवसङ्घा मनुष्याः
सदा तं गणेशं नमामो भजामः॥२॥

यतो वह्निभानू भवो भूर्जलं च
यतः सागराश्चन्द्रमा व्योम वायुः।
यतः स्थावरा जङ्गमा वृक्षसङ्घा
सदा तं गणेशं नमामो भजामः॥३॥

यतो दानवाः किन्नरा यक्षसङ्घा
यतश्चारणा वारणाः श्वापदाश्च।
यतः पक्षिकीटा यतो वीरूधश्च
सदा तं गणेशं नमामो भजामः॥४॥

यतो बुद्धिरज्ञाननाशो मुमुक्षोर्यतः
सम्पदो भक्तसन्तोषिकाः स्युः।
यतो विघ्ननाशो यतः कार्यसिद्धिः
सदा तं गणेशं नमामो भजामः॥५॥

यतः पुत्रसम्पद्यतो वाञ्छितार्थो
यतोऽभक्तविघ्नास्तथाऽनेकरूपाः।
यतः शोकमोहौ यतः काम एव
सदा तं गणेशं नमामो भजामः॥६॥

यतोऽनन्तशक्तिः स शेषो बभूव
धराधारणेऽनेकरूपे च शक्तः।
यतोऽनेकधा स्वर्गलोका हि नाना
सदा तं गणेशं नमामो भजामः॥७॥

यतो वेदवाचो विकुण्ठा मनोभिः
सदा नेति नेतीति यत्ता गृणन्ति।
परब्रह्मरूपं चिदानन्दभूतं
सदा तं गणेशं नमामो भजामः॥८॥

गणेश अष्टकम् का हिंदी अर्थ
पहला श्लोक

जिन भगवान गणेश की अनंत शक्ति से अनगिनत जीवों की उत्पत्ति हुई है और जिनसे संसार में विभिन्न गुणों का प्राकट्य हुआ है, जो तीनों गुणों से युक्त संपूर्ण संसार को प्रकाशित करते हैं, उन भगवान गणेश को हम सदैव नमन करते हैं।

दूसरा श्लोक

जिनसे संपूर्ण जगत का प्राकट्य हुआ और जिनसे ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र सहित देवताओं तथा मनुष्यों की उत्पत्ति हुई, उन भगवान गणेश को हम श्रद्धापूर्वक प्रणाम करते हैं।

तीसरा श्लोक

जिनसे अग्नि, सूर्य, पृथ्वी, जल, समुद्र, चंद्रमा, आकाश और वायु की उत्पत्ति हुई तथा जिनसे स्थावर-जंगम जीव और वृक्ष-वनस्पतियां प्रकट हुईं, उन गणपति को हम नमन करते हैं।

चौथा श्लोक

जिनसे दानव, किन्नर, यक्ष, हाथी, विभिन्न पशु-पक्षी, कीट-पतंगे और वनस्पतियों का प्राकट्य हुआ, उन भगवान गणेश को हम सदैव प्रणाम करते हैं।

पांचवां श्लोक

जिनकी कृपा से बुद्धि प्राप्त होती है और अज्ञान का नाश होता है। जिनके आशीर्वाद से भक्तों को सुख-संपत्ति मिलती है तथा विघ्न दूर होकर कार्यों में सफलता प्राप्त होती है, उन विघ्नहर्ता गणेश को हम नमन करते हैं।

छठा श्लोक

जिनकी कृपा से संतान, संपत्ति और मनोवांछित फल प्राप्त होने की धार्मिक मान्यता है तथा जिनके स्मरण से भक्त विघ्नों से मुक्ति की कामना करते हैं, उन भगवान गणेश को हम प्रणाम करते हैं।

सातवां श्लोक

जिनसे अनंत शक्ति वाले शेषनाग का प्राकट्य हुआ और जो पृथ्वी को धारण करने में समर्थ हैं, जिनसे अनेक प्रकार के स्वर्गलोकों का प्राकट्य हुआ, उन भगवान गणेश को हम नमन करते हैं।

आठवां श्लोक

जिनके वास्तविक स्वरूप का वर्णन करने में वेदों की वाणी भी असमर्थ हो जाती है और जिन्हें ‘नेति-नेति’ कहकर संबोधित किया जाता है, जो सच्चिदानंद स्वरूप परब्रह्म हैं, उन भगवान गणेश को हम सदैव प्रणाम करते हैं।

गणेश अष्टकम् की फलश्रुति

धार्मिक मान्यता के अनुसार गणेश अष्टकम् का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से भगवान गणेश की कृपा प्राप्त होती है। इसे विशेष रूप से बुद्धि, ज्ञान, कार्यसिद्धि और विघ्न निवारण से जोड़कर देखा जाता है। बुधवार, गणेश चतुर्थी और अन्य शुभ अवसरों पर भक्त इसका पाठ करते हैं।

पूजा के दौरान भगवान गणेश को दूर्वा और मोदक अर्पित करके दीपक जलाएं और शांत मन से गणेश अष्टकम् का पाठ करें। पाठ के बाद अपनी मनोकामना के साथ भगवान गणेश से सद्बुद्धि और जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना करें।धार्मिक ग्रंथों में बताए गए पाठ के फल आस्था और परंपरागत मान्यताओं पर आधारित हैं। इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित परिणाम नहीं माना जाना चाहिए।

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