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Shatrunjaya Parvat Mystery: 900 से ज्यादा मंदिर, फिर भी सूर्यास्त के बाद क्यों खाली हो जाता है ये जैन तीर्थस्थल?

Shatrunjaya Parvat Mystery: 900 से ज्यादा मंदिर, फिर भी सूर्यास्त के बाद क्यों खाली हो जाता है ये जैन तीर्थस्थल?

गुजरात के भावनगर जिले के पालीताना के पास स्थित शत्रुंजय पर्वत जैन धर्म के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में से एक माना जाता है। इस पर्वत पर 900 से अधिक छोटे-बड़े जैन मंदिरों का भव्य समूह मौजूद है। सफेद संगमरमर से बने मंदिरों की वास्तुकला और धार्मिक महत्व श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। लेकिन इस तीर्थस्थल की सबसे अनोखी बात यह है कि यहां सूर्यास्त के बाद किसी भी व्यक्ति के रुकने की अनुमति नहीं होती।

दिनभर श्रद्धालुओं और पर्यटकों से गुलजार रहने वाला यह पर्वत शाम होते ही पूरी तरह शांत हो जाता है। इसके पीछे धार्मिक परंपरा और सदियों पुरानी मान्यताओं को प्रमुख कारण माना जाता है।

भगवान आदिनाथ से जुड़ा है इतिहास

जैन परंपरा के अनुसार शत्रुंजय पर्वत का संबंध प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव यानी आदिनाथ से माना जाता है। मान्यता है कि भगवान आदिनाथ ने इसी पवित्र पर्वत पर ध्यान और तपस्या की थी। इसी वजह से जैन धर्म में इस स्थान को बेहद पवित्र दर्जा प्राप्त है।

कहा जाता है कि शत्रुंजय पर्वत पर अनेक तीर्थंकरों और जैन साधुओं ने साधना की। इसी धार्मिक महत्व के कारण यहां समय के साथ बड़ी संख्या में मंदिरों का निर्माण हुआ।

सूर्यास्त के बाद क्यों नहीं रुकते लोग?

शत्रुंजय पर्वत पर सूर्यास्त के बाद रुकने की परंपरा नहीं है। शाम होने से पहले श्रद्धालु पहाड़ से नीचे उतर आते हैं। मंदिरों के आसपास भी रात में सामान्य गतिविधियां नहीं होतीं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार यह स्थान तप, साधना और मोक्ष से जुड़ा हुआ है। जैन परंपरा में तीर्थस्थलों की पवित्रता और नियमों का विशेष महत्व है। इसी धार्मिक अनुशासन के तहत सूर्यास्त के बाद पर्वत पर रुकने की अनुमति नहीं दी जाती।

इससे जुड़ी कई लोककथाएं भी प्रचलित हैं। स्थानीय मान्यताओं में कहा जाता है कि रात के समय यह पर्वत आध्यात्मिक गतिविधियों का स्थान माना जाता है और यहां मनुष्यों का ठहरना उचित नहीं माना गया है। हालांकि इन मान्यताओं का ऐतिहासिक प्रमाण अलग विषय है।

हजारों सीढ़ियां चढ़कर पहुंचते हैं श्रद्धालु

शत्रुंजय पर्वत पर स्थित मंदिरों तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को लंबी चढ़ाई करनी पड़ती है। पर्वत पर हजारों सीढ़ियां बनी हुई हैं। भक्त सुबह-सुबह यात्रा शुरू करते हैं और मंदिरों में दर्शन-पूजन के बाद सूर्यास्त से पहले नीचे लौट आते हैं।

पूरे परिसर में मंदिरों की विशाल संख्या और उनकी नक्काशीदार वास्तुकला इसे बेहद खास बनाती है। यहां के मंदिरों में सफेद संगमरमर का व्यापक इस्तेमाल हुआ है, जिससे पूरा पर्वत दूर से भी बेहद आकर्षक दिखाई देता है।

सिर्फ धार्मिक नहीं, ऐतिहासिक दृष्टि से भी खास

शत्रुंजय पर्वत केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि भारतीय स्थापत्य और इतिहास की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। अलग-अलग कालखंडों में यहां मंदिरों का निर्माण और पुनर्निर्माण हुआ।

पर्वत पर मौजूद मंदिरों का समूह जैन समुदाय की समृद्ध धार्मिक परंपरा और वास्तुकला की झलक दिखाता है। यही वजह है कि देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु और जैन धर्म में रुचि रखने वाले लोग यहां पहुंचते हैं।

शत्रुंजय पर्वत की सबसे बड़ी खासियत यही है कि दिनभर घंटियों और भक्तों की आवाज से गूंजने वाला यह पवित्र स्थान सूर्यास्त के बाद अचानक शांत हो जाता है। रात में यहां रुकने की परंपरा और उससे जुड़ी धार्मिक मान्यताएं इस तीर्थस्थल को भारत के अन्य धार्मिक स्थलों से अलग और रहस्यमयी बनाती हैं।

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