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Sawan 2026: सावन में ही क्यों निकाली जाती है कांवड़ यात्रा? जानिए किसने की थी इसकी शुरुआत और क्या है इसका धार्मिक महत्व

Sawan 2026: सावन में ही क्यों निकाली जाती है कांवड़ यात्रा? जानिए किसने की थी इसकी शुरुआत और क्या है इसका धार्मिक महत्व

30 जुलाई 2026 से पवित्र सावन माह की शुरुआत हो चुकी है। इस महीने के शुरू होते ही देशभर में "बोल बम" और "हर-हर महादेव" के जयकारे गूंजने लगते हैं। लाखों शिवभक्त कांवड़ लेकर पवित्र गंगा, गंगोत्री, हरिद्वार, गौमुख, सुल्तानगंज और अन्य तीर्थ स्थलों से गंगाजल भरकर अपने-अपने शिवालयों तक पैदल यात्रा करते हैं और भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कांवड़ यात्रा सिर्फ सावन में ही क्यों निकाली जाती है और इसकी शुरुआत किसने की थी? आइए जानते हैं इससे जुड़ी धार्मिक मान्यताएं।

सावन में ही क्यों निकाली जाती है कांवड़ यात्रा?

धार्मिक मान्यता के अनुसार सावन का महीना भगवान शिव को सबसे प्रिय माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान जब हलाहल विष निकला, तब सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उसे अपने कंठ में धारण कर लिया। विष की तीव्र गर्मी को शांत करने के लिए देवताओं ने भगवान शिव पर गंगाजल अर्पित किया। तभी से सावन के महीने में शिवलिंग पर जलाभिषेक करने की परंपरा शुरू हुई।

मान्यता है कि सावन में गंगाजल से भगवान शिव का अभिषेक करने से वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। यही कारण है कि लाखों श्रद्धालु कांवड़ यात्रा कर गंगाजल लाते हैं और शिवलिंग पर अर्पित करते हैं।

कांवड़ यात्रा की शुरुआत किसने की थी?

कांवड़ यात्रा की उत्पत्ति को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं।

भगवान परशुराम से जुड़ी मान्यता

सबसे प्रचलित मान्यता के अनुसार भगवान परशुराम को पहला कांवड़िया माना जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने गंगाजल लाकर भगवान शिव का जलाभिषेक किया था। इसके बाद से कांवड़ यात्रा की परंपरा शुरू हुई और धीरे-धीरे यह पूरे उत्तर भारत में आस्था का बड़ा पर्व बन गई।

श्रवण कुमार की कथा

एक अन्य मान्यता के अनुसार श्रवण कुमार अपने माता-पिता को कांवड़ में बैठाकर तीर्थ यात्रा पर ले गए थे। उनकी सेवा, समर्पण और भक्ति के कारण कांवड़ को श्रद्धा और त्याग का प्रतीक भी माना जाता है।

रावण से जुड़ी मान्यता

कुछ पौराणिक कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि लंकेश रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए पवित्र जल अर्पित किया था। हालांकि, कांवड़ यात्रा की शुरुआत को लेकर सबसे अधिक प्रचलित मान्यता भगवान परशुराम से जुड़ी मानी जाती है।

कांवड़ यात्रा का धार्मिक महत्व

कांवड़ यात्रा केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि तप, अनुशासन और भक्ति का प्रतीक मानी जाती है। श्रद्धालु कई किलोमीटर तक पैदल चलकर गंगाजल लाते हैं और पूरे मार्ग में संयम, सात्विकता और धार्मिक नियमों का पालन करते हैं। मान्यता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई कांवड़ यात्रा से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और भक्तों के जीवन की बाधाएं दूर होती हैं।

कांवड़ यात्रा के दौरान किन नियमों का पालन किया जाता है?

  • सात्विक भोजन और संयम का पालन किया जाता है।
  • मांस, मदिरा और तामसिक भोजन से दूरी रखी जाती है।
  • गंगाजल को अत्यंत पवित्र मानकर उसे जमीन पर नहीं रखा जाता।
  • पूरे मार्ग में भगवान शिव के नाम का स्मरण और भजन-कीर्तन किया जाता है।
  • शिवलिंग पर विधि-विधान से गंगाजल अर्पित किया जाता है।

क्या मिलता है कांवड़ यात्रा का फल?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन में श्रद्धापूर्वक कांवड़ यात्रा कर भगवान शिव का जलाभिषेक करने से पापों का क्षय होता है, मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

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