ज्योतिष न्यूज़ डेस्क: भारत में कण्व नाम के अनेक व्यक्ति हुए हैं जिनमें सबसे अधिक प्रसिद्ध महर्षि कण्व थे जिन्होंने अप्सरा मेनका के गर्भ से उत्पन्न विश्वामित्र की कन्या शकुंतला को पाला था। शकुन्तला के धर्मपतिा के रूप में महर्षि कण्व की अत्यंत प्रसिद्धि हैं तो आज हम आपको दुस्यंत और शकुंतला की अनोखी प्रेम कथा के बारे में बता रहे हैं तो आइए जानते हैं।

एक बार हस्तिनापुर नरेश दुष्यंत आखेट खेलने वन में गये। जिस वन में वे शिकार के लिये गये थे उसी वन में कण्व ऋषि का आश्रम था। राजा दुष्यंत कण्व ऋषि के दर्शन के लिए उनके आश्रम पहुंच गए। लावण्यमयी कन्या ने आश्रम से निकल कर कहा महर्षि तो तीर्थ यात्रा पर गए हैं किन्तु आपका इस आश्रम में स्वागत हैं उस कन्या को देख कर महाराज ने पूछा बालिके आप कौन हैं बालिका ने कहा मेरा नाम शकुन्तला हैं और मैं कण्व ऋषि की पुत्री हूं। इस पर दुष्यंत आश्चर्यचकित होकर बोले महर्षि तो आजन्म ब्रह्मचारी है फिर पुत्री कैसे हुई। तब कन्या ने पूरी बात बताई। शकुन्तला के वचनों को सुनकर राजा कहते हैं तुम क्षत्रिय कन्या हो। तुम्हारे सौन्दर्य को देखकर मैं अपना ह्रदय तुम्हें अर्पित कर चुका हूं।

आपत्ति न हो तो मैं तुमसे विवाह करना चाहता हूं। शकुन्तला भी महाराज पर मोहित हो चुकी थी। अत: उसने अपनी स्वीकृति प्रदान की। दोनों ने गन्धर्व विवाह कर लिया। कुछ काल महाराज ने शकुन्तला के साथ विहार करते हुए वन में ही व्यतीत किया। फिर शकुन्तला बोले अब अपना राजकार्य देखने के लिए आपको हस्तिनापुर प्रस्थान करना होगा। कण्व ऋषि के तीर्थ यात्रा से लौट आने पर मैं तुम्हें यहां से विदा करा कर अपने राजभवन में ले जाउगा। इतना कहर महाराज को अपने प्रेम के प्रतीक के रूप में अपनी स्वर्ण मुद्रिका दी और हस्तिनापुर चले गए।

आश्रम में दुर्वासा ऋषि पधारे। महाराज के विरह में लीन होने के कारण शकुन्तला को उनके आगमन का ज्ञान भी नहीं हुआ और उसने दुर्वासा ऋषि का यथोचित स्वागत नहीं किया। ऋषि ने इसे अपना अपमान समझा और कोधित होकर बोले, मैं तुझे शाप देता हूं कि जिस किसी के ध्यान में लीन होकर तूने मेरा निरादर किया हैं वह तुझे भूल जाएगा। ऋषि के शाप को सुनकर शकुन्तला का ध्यान टूटा और वह उनके चरणों में गिर कर क्षमा मांगने लगी। क्षमा प्रार्थना से द्रवित होकर ऋषि ने कहा अच्छा अगर तेरे पास उसका कोई प्रेम चिन्ह होगा तो उस चिन्ह को देख उसे तेरी स्मृति हो जायेगी।


