पितृपक्ष में पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है। बदलते समय के साथ अब गया, वाराणसी, हरिद्वार, प्रयागराज, पुष्कर जैसे तीर्थस्थलों पर ऑनलाइन श्राद्ध और ई-पिंडदान की सुविधा भी उपलब्ध होने लगी है। खासकर विदेश या दूर-दराज रहने वाले लोग वीडियो कॉल के जरिए पुरोहित से पूजा करवाते हैं। गया में 2026 के पितृपक्ष मेले के दौरान ऑनलाइन ई-पिंडदान की सुविधा भी उपलब्ध होने की जानकारी सामने आई है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ऑनलाइन श्राद्ध करना धार्मिक रूप से सही है और क्या इससे श्राद्ध का पूरा फल मिलता है?
ऑनलाइन श्राद्ध को लेकर क्या मान्यता है?
इस विषय पर धार्मिक परंपराओं में एकराय नहीं है। लाइव हिन्दुस्तान से बातचीत में ज्योतिषाचार्य विभोर इंदुसुत ने बताया कि यदि परिवार में श्राद्ध करने वाला व्यक्ति मौजूद है, तो उसे स्वयं तर्पण और श्राद्ध कर्म करना चाहिए। उनके अनुसार केवल ऑनलाइन माध्यम से कराया गया श्राद्ध पारंपरिक विधि का पूरी तरह विकल्प नहीं माना जाता।
वहीं, यदि कोई व्यक्ति विदेश में है या किसी ऐसी परिस्थिति में है जिसमें वह तीर्थस्थल पर नहीं पहुंच सकता, तो ऑनलाइन माध्यम से पुरोहित के जरिए कर्म कराने की व्यवस्था का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसे सुविधा के तौर पर देखा जा सकता है, लेकिन स्थानीय परंपरा और कुल पुरोहित की सलाह को प्राथमिकता देना उचित माना जाता है।
घर पर खुद कर सकते हैं तर्पण
अगर गया या किसी अन्य तीर्थस्थल पर जाना संभव नहीं है, तो घर पर भी पितरों को श्रद्धापूर्वक जल अर्पित किया जा सकता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार स्नान के बाद दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों का तर्पण किया जाता है। इसके साथ पितरों को याद कर उनकी शांति और सद्गति की प्रार्थना की जाती है।
कुछ धार्मिक मार्गदर्शिकाओं में भी कहा गया है कि पंडित उपलब्ध न होने की स्थिति में श्रद्धापूर्वक जल तर्पण, अन्न अर्पण, जरूरतमंदों को भोजन और दान-पुण्य जैसे कार्य किए जा सकते हैं।
2026 में कब से है पितृपक्ष?
2026 में तिथियों को लेकर अलग-अलग पंचांगों में थोड़ा अंतर दिखाई दे रहा है। कई पंचांगों के अनुसार 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध है और 27 सितंबर से प्रतिपदा श्राद्ध शुरू होगा। 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या होगी। इसलिए अपने परिवार की परंपरागत श्राद्ध तिथि के अनुसार कर्म करना महत्वपूर्ण है।
ऑनलाइन से ज्यादा महत्वपूर्ण है श्रद्धा और विधि
श्राद्ध का मूल भाव पितरों का स्मरण, श्रद्धा और तर्पण है। इसलिए यदि ऑनलाइन व्यवस्था का सहारा लेना पड़े तो किसी विश्वसनीय पुरोहित या धार्मिक संस्था के माध्यम से विधि कराने की जानकारी पहले लें। लेकिन यदि परिवार में कोई व्यक्ति स्वयं श्राद्ध कर सकता है, तो अपनी परंपरा और कुल पुरोहित के मार्गदर्शन में घर पर तर्पण करना एक व्यावहारिक विकल्प हो सकता है।
धार्मिक कर्मकांड की विधियां अलग-अलग संप्रदाय, क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार बदल सकती हैं। इसलिए विशेष परिस्थिति में स्थानीय आचार्य या कुल पुरोहित से सलाह लेना बेहतर है।

