जैन धर्म का सबसे पवित्र पर्वों में से एक पर्युषण पर्व आत्मचिंतन, संयम, तप और क्षमा का पर्व माना जाता है। भाद्रपद मास में प्रकृति की सुंदरता अपने चरम पर होती है। चारों ओर हरियाली, फूलों और पत्तियों से समृद्ध वातावरण के बीच जैन समाज इस पर्व के दौरान आध्यात्मिक साधना और आत्मशुद्धि पर ध्यान केंद्रित करता है।
पर्युषण पर्व 2026 कब से कब तक रहेगा?
श्वेतांबर जैन परंपरा के अनुसार पर्युषण पर्व 8 सितंबर 2026 से शुरू होकर 15 सितंबर 2026 तक चलेगा। इसका अंतिम दिन संवत्सरी के रूप में मनाया जाता है, जिसे क्षमा मांगने और क्षमा करने का विशेष दिन माना जाता है।
वहीं, दिगंबर जैन परंपरा में इससे संबंधित दशलक्षण पर्व 10 दिनों तक मनाया जाता है।
पर्युषण पर्व का धार्मिक महत्व
पर्युषण का अर्थ आत्मा के करीब आना और अपने भीतर झांकना माना जाता है। इस दौरान श्रद्धालु:
- आत्मचिंतन और स्वाध्याय करते हैं।
- उपवास, एकासन और अन्य तप करते हैं।
- अहिंसा, सत्य और संयम के मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं।
- अपने द्वारा हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगते हैं।
संवत्सरी का महत्व
पर्युषण के अंतिम दिन संवत्सरी मनाई जाती है। इस दिन जैन धर्मावलंबी सभी जीवों से क्षमा याचना करते हैं और कहते हैं— “मिच्छामि दुक्कड़म्”, जिसका भाव है कि जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा करें।
पर्युषण के दौरान रखे जाते हैं ये नियम
- सात्विक जीवनशैली अपनाने का प्रयास किया जाता है।
- क्रोध, अहंकार और नकारात्मक भावों से दूर रहने की कोशिश की जाती है।
- धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन और प्रवचन सुनने की परंपरा है।
- अपनी क्षमता के अनुसार तप और उपवास किए जाते हैं।
पर्युषण पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मसंयम, क्षमा और मन की शुद्धि का अवसर माना जाता है। यह पर्व व्यक्ति को अपने व्यवहार और कर्मों पर विचार करने की प्रेरणा देता है।

