नरक चतुर्दशी पर कृष्ण की जय-जयकार होती है, पर असली हीरो तो सत्यभामा थीं? पढ़ें पौराणिक कथा
दीपावली से एक दिन पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी को छोटी दिवाली और रूप चौदस के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की ओर से नरकासुर का वध किए जाने की कथा सुनाई जाती है। मान्यता है कि इसी विजय की खुशी में घरों में दीप जलाए जाते हैं और सुबह अभ्यंग स्नान किया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि नरकासुर के अंत की इस कहानी में भगवान कृष्ण के साथ उनकी पत्नी सत्यभामा की भी अहम भूमिका थी? कुछ पौराणिक और क्षेत्रीय कथाओं में तो सत्यभामा को ही इस युद्ध की असली नायिका बताया गया है।
कौन था नरकासुर?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, नरकासुर को भौमासुर भी कहा जाता था। वह पृथ्वी देवी यानी भूदेवी का पुत्र था और प्राग्ज्योतिषपुर का राजा था। शुरुआत में वह शक्तिशाली शासक माना जाता था, लेकिन धीरे-धीरे उसके भीतर अहंकार और अत्याचार बढ़ने लगे। उसने देवताओं को परेशान करना शुरू कर दिया।
नरकासुर ने देवराज इंद्र का छत्र छीन लिया और देवमाता अदिति के कुंडल भी चुरा लिए। इतना ही नहीं, उसने अलग-अलग राज्यों की 16 हजार राजकुमारियों को बंदी बनाकर अपने महल में कैद कर रखा था। उसके अत्याचारों से परेशान होकर देवता भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुंचे और उनसे सहायता मांगी।
कृष्ण के साथ युद्ध में गईं सत्यभामा
भागवत पुराण के दशम स्कंध के अध्याय 59 में वर्णन मिलता है कि भगवान श्रीकृष्ण नरकासुर का अंत करने के लिए गरुड़ पर सवार होकर प्राग्ज्योतिषपुर पहुंचे। इस युद्ध में उनकी पत्नी सत्यभामा भी उनके साथ थीं। दोनों ने मिलकर नरकासुर के मजबूत किले और सुरक्षा व्यवस्था को पार किया।
नरकासुर की सेना में मुर नाम का एक शक्तिशाली असुर भी था। भगवान कृष्ण ने उसका वध किया। इसी कारण उन्हें मुरारी भी कहा जाता है। इसके बाद नरकासुर अपनी विशाल सेना के साथ युद्ध के मैदान में पहुंचा। दोनों पक्षों के बीच भीषण युद्ध हुआ।
सत्यभामा को क्यों माना जाता है असली नायिका?
इस कथा का सबसे रोचक हिस्सा नरकासुर के वध से जुड़ा है। भागवत पुराण के अनुसार, युद्ध के दौरान भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से नरकासुर का वध किया था। सत्यभामा उस समय उनके साथ मौजूद थीं और युद्ध में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी।
हालांकि, दक्षिण भारत और महाराष्ट्र में प्रचलित एक लोकप्रिय क्षेत्रीय कथा इसके अलग रूप का वर्णन करती है। इस मान्यता के अनुसार, नरकासुर को वरदान प्राप्त था कि उसका अंत उसकी माता के हाथों ही होगा। चूंकि सत्यभामा को भूदेवी का स्वरूप माना जाता है, इसलिए उन्होंने ही युद्ध में अंतिम प्रहार करके नरकासुर का वध किया।
कुछ लोककथाओं में बताया जाता है कि युद्ध के दौरान जब भगवान कृष्ण घायल होकर अचेत हो गए, तब सत्यभामा ने धनुष उठाया और नरकासुर पर बाण चलाकर उसका अंत कर दिया। इस तरह इस परंपरा में सत्यभामा को नरकासुर वध की निर्णायक नायिका माना जाता है।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि सत्यभामा द्वारा अंतिम प्रहार करने वाली कथा क्षेत्रीय मान्यताओं में प्रचलित है। भागवत पुराण में नरकासुर का वध भगवान कृष्ण के सुदर्शन चक्र से हुआ बताया गया है।
नरकासुर के वध के बाद क्या हुआ?
नरकासुर के अंत के बाद भगवान कृष्ण ने उसके महल में बंदी बनाई गई राजकुमारियों को मुक्त कराया। उन्होंने देवमाता अदिति के कुंडल भी वापस लौटाए। नरकासुर के पुत्र भगदत्त को भी भगवान कृष्ण ने संरक्षण देने का आश्वासन दिया और उसका राज्य उसे सौंप दिया।
क्यों मनाई जाती है नरक चतुर्दशी?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, नरकासुर के अत्याचारों से मुक्ति मिलने और बुराई पर अच्छाई की जीत की खुशी में नरक चतुर्दशी मनाई जाती है। इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले तेल लगाकर स्नान करने की परंपरा है। इसे अभ्यंग स्नान कहा जाता है। शाम को घरों में दीपक जलाए जाते हैं। कई स्थानों पर यमराज के नाम से दीपदान भी किया जाता है।
इस पर्व का संदेश है कि अहंकार और अत्याचार चाहे कितने ही शक्तिशाली क्यों न हों, अंत में सत्य और धर्म की विजय होती है। नरक चतुर्दशी की कथा में भगवान कृष्ण के पराक्रम के साथ सत्यभामा के साहस और युद्ध में उनकी भागीदारी को भी याद किया जाता है।

