अहिंसा के कई पक्ष हैं। इसके अंतर्गत विचारों, वचनों या कर्मों के जरिये किसी को भी चोट न पहुंचाना आता है। अहिंसा के कई ऐसे रंग हैं, जिनके बारे में हम कभी सोचते भी नहीं। हम जानते हैं कि हमें किसी को मारना या चोट पहुंचाना नहीं चाहिए, पर जब मन और वचनों से अहिंसा की बात आती है, तो हम काफी लापरवाह होते हैं।
बुद्धिमान या हाजिरजवाब दिखाते समय क्या करें
हम जानते हैं हमें किसी को गाली नहीं देनी चाहिए। किसी का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए। हम दिन में कई बार ऐसी बातें भी कहते हैं, जिनसे हमारा अहंकार बढ़ता है या दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुंचती है। हम लोगों की कमियां निकालते हैं। उनकी चोट पर नमक छिड़कते हैं। अक्सर हम दूसरों पर कटाक्ष करते हैं, ताकि हम निराले लगें या दूसरों से अधिक बुद्धिमान लगें। हम अपने आपको बुद्धिमान या हाजिरजवाब दिखाना चाहते हैं पर ऐसा करके हम दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुंचाते हैं। हम दूसरे धर्मों, दूसरे देशों, दूसरे रंगों या दूसरे लिंग के लोगों के प्रति बुरी टिप्पणियां करते हैं। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हम ऐसा कुछ न कहें, जिनसे उन लोगों का अनादर होता हो, जो हमसे किसी भी तरह से अलग हैं।
उत्तेजना के क्षणों में क्या करें
वचनों में हिंसा का एक अन्य रूप है- परिवारों, दोस्तों, पति-पत्नी, मां-बाप और बच्चों के बीच लड़ाइयां। दो इंसानों के बीच विचारों का मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन इसकी वजह से लड़ाई की नौबत नहीं आनी चाहिए। असहमति होना तो ठीक है, लेकिन लड़ाई में हिंसा आ जाती है और दोनों दल अपनी-अपनी बात कहने के लिए उत्तेजक शब्दों का प्रयोग करने लगते हैं। उत्तेजना के क्षणों में हम ऐसी कई बातें कह देते हैं, जो असत्य होती हैं, कठोर होती हैं और केवल सामने वाले का दिल दुखाने के लिए या उसे नीचा दिखाने के लिए कही जाती हैं। हो सकता है कि हम बाद में अपनी बातों पर पछताएं भी, लेकिन तब तक चोट पहुंच चुकी होती है।
असहमति को कभी भी लड़ाई में न बदलने दें
हमें अपने शब्दों को सावधानी से संभलकर बोलना चाहिए। अगर हम शांतिपूर्वक एक-दूसरे से असहमत हों, तो यह ठीक है। हम अपनी असहमति को कभी भी लड़ाई में न बदलने दें। अपने वाद-विवाद में हमेशा संयम व धैर्य बनाए रखें। अगर हम ऐसा कर सकें, तो हम पाएंगे कि हमारी सारी समस्याएं प्रेम से सुलझ जाएंगी और इस प्रक्रिया में हम न तो किसी और को ठेस पहुंचाएंगे और न ही खुद को।

