Navratri 2026: घटस्थापना में क्यों बोए जाते हैं जौ? जानें धार्मिक मान्यता और सप्तधान्य का महत्व
नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना के दौरान जौ बोने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। मिट्टी के पात्र में बोए गए जौ के बीज नौ दिनों तक बढ़ते हैं और उनसे निकलने वाले हरे अंकुर देवी उपासना के साथ जीवन, ऊर्जा, वृद्धि और समृद्धि के प्रतीक माने जाते हैं।
मिट्टी के पात्र में ही क्यों बोए जाते हैं जौ?
घटस्थापना के समय आमतौर पर चौड़े मिट्टी के पात्र में मिट्टी भरकर उसमें जौ के बीज बोए जाते हैं। धार्मिक परंपरा में मिट्टी को पृथ्वी तत्व का प्रतीक माना जाता है। इसी मिट्टी में बीज अंकुरित होकर पौधे का रूप लेते हैं, इसलिए जौ के अंकुरण को प्रकृति और जीवन-चक्र से जोड़ा जाता है।
इसी पात्र में जौ या अन्य अनाज बोने के बाद उसके बीच कलश स्थापित किया जाता है। बीज, मिट्टी, जल और कलश मिलकर प्रकृति, जीवन और देवी शक्ति के प्रति श्रद्धा का प्रतीकात्मक रूप प्रस्तुत करते हैं।
जौ को माना जाता है जीवन और वृद्धि का प्रतीक
धार्मिक मान्यताओं में जौ को सृष्टि के शुरुआती अनाजों में से एक माना गया है। इसी वजह से नवरात्रि में इसके बीज बोने की परंपरा को जीवन के विकास और सकारात्मक वृद्धि से जोड़ा जाता है।
नौ दिनों में जौ के अंकुरों का बढ़ना भी विशेष रूप से देखा जाता है। मान्यता के अनुसार इनके विकास को घर में सुख-समृद्धि और उन्नति की कामना से जोड़ा जाता है।
अन्न और समृद्धि से भी जुड़ी है परंपरा
जौ प्राचीन समय से ही प्रमुख अनाजों में शामिल रहा है। इसलिए घटस्थापना के दौरान जौ बोने की परंपरा को अन्न, समृद्धि और खुशहाली की कामना से भी जोड़ा जाता है। नवरात्रि में देवी की पूजा के साथ प्रकृति और अन्न के प्रति कृतज्ञता का भाव भी इस परंपरा में दिखाई देता है।
घटस्थापना में सप्तधान्य का भी उल्लेख
घटस्थापना की कुछ पारंपरिक विधियों में सप्तधान्य, यानी सात प्रकार के अनाज का उल्लेख मिलता है। इनमें जौ, तिल, धान, मूंग, कंगनी, चना और गेहूं शामिल बताए जाते हैं।
इस तरह घटस्थापना में अनाज बोने की परंपरा केवल पूजा की एक विधि नहीं, बल्कि प्रकृति, अन्न, जीवन और समृद्धि के साथ धार्मिक आस्था के जुड़ाव को भी दर्शाती है।

