मंगल और सूर्य दोनों नीच के, जानें एस्ट्रोलॉजर से अगले 22 दिन जनमानस के लिए अच्छे या खराब?
वैदिक ज्योतिष शास्त्र में मंगल और सूर्य दोनों ही महत्वपूर्ण ग्रह माने जाते हैं। मंगल साहस, ऊर्जा, पराक्रम और भूमि का कारक है, जबकि सूर्य आत्मा, पिता और आत्मविश्वास का कारक है। मंगल को ग्रहों का सेनापति माना जाता है, जबकि सूर्य ग्रहों के राजा हैं। वर्तमान समय में मंगल और सूर्य दोनों ही अपनी नीचस्थ अवस्था में हैं। आसान शब्दों में कहा जाए तो यह दोनों ग्रह अपनी नीच राशि में विराजमान हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार, मंगल ने 18 अक्टूबर 2026 को अपनी नीच राशि कर्क में प्रवेश किया था, जबकि सूर्य 17 अक्टूबर 2026 को अपनी नीच राशि तुला में आए थे। सूर्य 16 नवंबर 2026 तक तुला राशि में रहेंगे, जबकि मंगल 12 नवंबर 2026 तक कर्क राशि में संचरण करेंगे। पंडित नरेंद्र उपाध्याय बताते हैं कि इस तरह से सूर्य और मंगल दोनों ग्रह करीब 22 दिन तक अपनी नीचस्थ अवस्था में साथ रहेंगे। इसके बाद राशि बदलते ही दोनों की अवस्था में परिवर्तन हो जाएगा। पंडित जी कहते हैं कि सूर्य और मंगल की नीच अवस्था को लेकर लोगों के मन में कई बातें चलती हैं ग्रह नीच के हैं अच्छे परिणाम देंगे या नहीं। लाभ होगा या हानि के संकेत हैं, वगैरह-वगैरह। जबकि ज्योतिष शास्त्र कहता है कि नीच के मंगल और सूर्य व्यक्ति के आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकते हैं या निर्णय लेने की क्षमता में प्रभाव पड़ सकता है। लेकिन जनमानस को बहुत ज्यादा घबराने या डरने जैसी बात नहीं है। जानें एस्ट्रोलॉजर से नीचस्थ सूर्य और मंगल जनमानस पर कैसा प्रभाव डालेंगे।
नीचस्थ मंगल और सूर्य जनमानस के लिए शुभ या अशुभ:
पंडित नरेंद्र उपाध्याय के अनुसार, कर्क राशि में मंगल का नीच होना बहुत खराब स्थिति नहीं है। क्योंकि कर्क राशि के लिए मंगल पंचमेश होते हैं। अगर कालपुरुष की कुंडली को देखा जाए तो मंगल प्रथम भाव का स्वामी होकर चतुर्थ भाव में जाता है। इसलिए मंगल का कर्क राशि में नीच का होना बिल्कुल भी अनर्थ या खराब परिणाम देने वाली नहीं है।
पंडित जी आगे बताते हैं कि कर्क राशि के स्वामी चंद्रमा हैं। चंद्रमा के घर में मंगल को नीच होने का विधान इसलिए बनाया गया है क्योंकि चंद्रमा मंगल की क्रूरता में कमी लाता है। मंगल और चंद्रमा आपस में मिलकर लक्ष्मी योग का निर्माण करते हैं। शास्त्रार्थ है कि चंद्रमा के घर में मंगल का नीच अवस्था में होना बिल्कुल भी नुकसानदायक नहीं होता है। पंडित जी बताते हैं कि नीच का अर्थ नीचे जाना है। अगर मकर राशि में उच्च का है तो मतलब मंगल सामने विराजमान है और नीच अवस्था में नीचे संचरण करता है।
दिवाली के समय नीच के होते हैं सूर्य:
पंडित उपाध्याय कहते हैं कि अगर सूर्य के नीच अवस्था की बात करें तो हर वर्ष दिवाली के आसपास सूर्य नीच अवस्था में जाते हैं। दिवाली का पर्व सूर्य की नीच अवस्था में या उसके आसपास ही मनाया जाता है। सूर्य जब तुला राशि में जाते हैं तो उनकी किरणों में नर्माहट शुरू होती है और यह नर्माहट धनु राशि तक चलती है। इसके बाद जब सूर्य मकर राशि में जाते हैं, तो मकर संक्रांति मनाई जाती है। मकर राशि में आने के बाद सूर्य अपनी किरणों में उग्रता लाते हुए आगे बढ़ जाते हैं।
जनमानस के लिए स्थितियां खराब नहीं:
पंडित नरेंद्र उपाध्याय के अनुसार, सूर्य और मंगल का नीच होना यह दोनों स्थितियां जनमानस के लिए किसी भी तरह से खराब नहीं हैं। यह किसी को भी बहुत नुकसान नहीं पहुंचाने वाला साबित होगा। अगर कालपुरुष से कुंडली का मिलान करेंगे तो कालपुरुष का सूर्य पंचमेश है और पंचमेश सूर्य का सप्तम भाव में जाना प्रेम को बढ़ाता है। वैवाहिक जीवन में अच्छा प्रभाव डालता है। इसलिए इन दोनों स्थितियों को जनमानस के लिए खराब या भयावह कहना उचित नहीं है।

