Mahalakshmi Temple: साल में दो बार सूर्य की किरणों से जगमगाती है देवी की प्रतिमा, 300 साल पुरानी परंपराओं से जुड़ा है कोल्हापुर मंदिर
महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित महालक्ष्मी मंदिर अपनी अनूठी वास्तुकला, प्राचीन मान्यताओं और धार्मिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर की सबसे खास बात यह है कि साल में दो बार डूबते सूरज की किरणें सीधे गर्भगृह तक पहुंचती हैं। इस दौरान सूर्य की रोशनी पहले देवी के चरणों पर, फिर कमर और अंत में पूरी प्रतिमा पर पड़ती है। इस अद्भुत घटना को किरणोत्सव कहा जाता है।
नवरात्रि के दौरान मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और पालकी यात्राएं आयोजित की जाती हैं। पंचमी से लेकर महाअष्टमी और महानवमी तक कई ऐसी परंपराएं निभाई जाती हैं, जिनका संबंध देवी महालक्ष्मी की कथाओं और कोल्हापुर के धार्मिक इतिहास से है।
काले पत्थर की प्रतिमा, मुकुट पर शिवलिंग
मंदिर के गर्भगृह में देवी महालक्ष्मी की करीब तीन फीट ऊंची काले पत्थर की प्रतिमा स्थापित है। देवी पश्चिम दिशा की ओर मुख किए हुए हैं। उनके चार हाथों में म्हालुंग नाम का नींबू जैसा फल, गदा, ढाल और पानपात्र है। प्रतिमा के पीछे पत्थर का सिंह बना हुआ है।
देवी के मुकुट पर शिवलिंग, उसके चारों ओर योनि का चिह्न और ऊपर नाग का फन दर्शाया गया है। गर्भगृह के दोनों ओर महाकाली और महासरस्वती के मंदिर हैं। मंदिर परिसर में मातुलिंग महादेव का पूजा स्थल भी मौजूद है।
पालकी में निकलती है करीब 250 साल पुरानी उत्सव प्रतिमा
मंदिर में पूजा के लिए स्थापित मूल प्रतिमा के अलावा देवी की एक अलग उत्सव प्रतिमा भी है, जिसे पालकी में विराजमान कर मंदिर से बाहर निकाला जाता है। यह प्रतिमा लगभग 12 इंच ऊंची और चार इंच चौड़ी बताई जाती है। इसमें देवी सिंह पर बैठी दिखाई देती हैं।
इस प्रतिमा का मुख्य हिस्सा तांबे से बना है, जबकि चेहरा चांदी और हथियार पीतल के हैं। इसके पीछे की चौकी भी पीतल की है। बताया जाता है कि इसके अलग-अलग हिस्सों को बिना वेल्डिंग के जोड़ा गया है। यह परंपरा करीब 250 साल पुरानी मानी जाती है।
उत्सव प्रतिमा के लिए अलग सिंहासन है। इसकी पूजा के दौरान स्नान और कुमकुम अर्चन किया जाता है। प्रतिमा को संभालने की जिम्मेदारी मंदिर के पुजारियों की होती है। नवरात्रि में हर रात देवी की पालकी यात्रा निकाली जाती है।
पंचमी पर सखी त्र्यंबोली से मिलने जाती हैं महालक्ष्मी
नवरात्रि की ललिता पंचमी पर मंदिर में त्र्यंबोली यात्रा का आयोजन होता है। इस दिन देवी महालक्ष्मी की पालकी कोल्हापुर की टेंबलाई पहाड़ी पर स्थित त्र्यंबोली देवी मंदिर तक जाती है। धार्मिक परंपरा में त्र्यंबोली को महालक्ष्मी की सखी माना जाता है।
मान्यता के अनुसार, कोल्हासुर के वध के बाद उसके वंशज कामाक्ष ने देवताओं को संकट में डाल दिया था। त्र्यंबोली ने उसका अंत कर देवताओं को संकट से मुक्त कराया। हालांकि, विजय के बाद देवता उनका सम्मान करना भूल गए, जिससे नाराज होकर त्र्यंबोली पहाड़ी पर चली गईं।
इसके बाद देवी महालक्ष्मी उन्हें मनाने के लिए स्वयं वहां पहुंचती हैं। दोनों देवियों के मिलन की पूजा के बाद कुष्मांड भेदन की रस्म निभाई जाती है। इसमें कद्दू को राक्षस का प्रतीक मानकर फोड़ा जाता है। यह रस्म एक छोटी कन्या से कराई जाती है।
महाअष्टमी की रात नहीं होती देवी की शयन आरती
महाअष्टमी के दिन देवी को महिषासुर का वध करने वाले स्वरूप में सजाया जाता है। परंपरा के अनुसार, रात करीब 9 बजे देवी की पालकी नगर भ्रमण के लिए निकलती है। इस यात्रा को कोल्हापुर के लोगों को निर्भय रहने का भरोसा देने वाली देवी की परंपरा से जोड़ा जाता है।
यात्रा के दौरान भवानी मंडप स्थित मंदिर में तुलजा भवानी और महालक्ष्मी के मिलन की रस्म भी निभाई जाती है। नगर भ्रमण से लौटने के बाद देवी की विशेष पूजा होती है।
इस रात नियमित शेजारती यानी शयन आरती नहीं की जाती। मान्यता है कि महाअष्टमी पर देवी शयन नहीं करतीं। आधी रात को विशेष हवन होता है और अगले दिन सुबह की काकड़ आरती भी नहीं होती।
महानवमी पर हवन, कद्दू की प्रतीकात्मक बलि और शस्त्र पूजा
महानवमी के दिन सुबह करीब 3 बजे सप्तशती पाठ के साथ विशेष हवन शुरू होता है। इसमें तिल, चावल और घी की आहुतियां दी जाती हैं। अनुष्ठान के दौरान कद्दू की प्रतीकात्मक बलि भी दी जाती है।
हवन की पूर्णाहुति और तोप की सलामी के साथ नवरात्रि के अनुष्ठानों का समापन होता है। इस दिन पारंपरिक शस्त्रों की पूजा भी की जाती है। ये परंपराएं मंदिर की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती हैं।
1715 में दशहरे पर दोबारा स्थापित हुई थी प्रतिमा
कोल्हापुर के महालक्ष्मी मंदिर का इतिहास भी कई महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़ा है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, 14वीं और 15वीं शताब्दी में मंदिर पर हुए हमलों के दौरान पुजारियों ने देवी की मूल प्रतिमा को सुरक्षित रखने के लिए वहां से हटा दिया था। इसे कपिलतीर्थ क्षेत्र में एक पुजारी के घर छिपाकर रखा गया।
कई पीढ़ियों बाद नरहर भट सावगांवकर ने छत्रपति संभाजी द्वितीय को प्रतिमा के बारे में जानकारी दी। मान्यता है कि उन्हें सपने में देवी ने अपनी प्रतिमा के स्थान का संकेत दिया था। इसके बाद छत्रपति ने सरदार सिदोजी हिंदुराव घोरपड़े को प्रतिमा वापस मंदिर में स्थापित कराने का आदेश दिया।
बताया जाता है कि 26 सितंबर 1715 को दशहरे के अवसर पर देवी की प्रतिमा को दोबारा मंदिर में स्थापित किया गया। इसके बाद मंदिर में नियमित पूजा और उत्सवों के संचालन के लिए जमीन भी दान की गई।
कोल्हापुर का महालक्ष्मी मंदिर आज भी अपनी प्राचीन प्रतिमा, सूर्य की किरणों से जुड़े किरणोत्सव और नवरात्रि की विशिष्ट परंपराओं के कारण श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है। यहां की धार्मिक रस्में देवी महालक्ष्मी के प्रति आस्था के साथ-साथ क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को भी दर्शाती हैं।

