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Kamakhya Temple: कामाख्या मंदिर का कछुआ कुंड क्यों है इतना खास? 200-300 साल पुराने कछुओं से जुड़ी है अनोखी मान्यता

Kamakhya Temple: कामाख्या मंदिर का कछुआ कुंड क्यों है इतना खास? 200-300 साल पुराने कछुओं से जुड़ी है अनोखी मान्यता

असम के नीलांचल पर्वत पर स्थित प्रसिद्ध कामाख्या मंदिर केवल शक्तिपीठ होने के कारण ही नहीं, बल्कि अपने कई रहस्यमयी और पवित्र स्थलों के लिए भी जाना जाता है। इन्हीं में से एक है कछुआ कुंड, जिसे श्रद्धालु अत्यंत पवित्र मानते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस कुंड के दर्शन और यहां मौजूद कछुओं को देखना शुभ माना जाता है। कहा जाता है कि यहां श्रद्धा से प्रार्थना करने पर भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। हालांकि, ये मान्यताएं धार्मिक आस्था और स्थानीय परंपराओं पर आधारित हैं।

क्या है कछुआ कुंड?

कामाख्या मंदिर परिसर में स्थित कछुआ कुंड एक प्राचीन जलकुंड है, जहां बड़ी संख्या में कछुए रहते हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इनमें से कुछ कछुओं की आयु 200 से 300 वर्ष तक बताई जाती है। हालांकि, इस दावे की वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है, लेकिन श्रद्धालुओं के बीच यह विश्वास आज भी प्रचलित है।

कुर्म अवतार से जुड़ी है मान्यता

हिंदू धर्म में कछुए को भगवान विष्णु के कुर्म अवतार का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि कछुआ स्थिरता, धैर्य, दीर्घायु और समृद्धि का प्रतीक होता है। इसी वजह से कामाख्या मंदिर के कछुआ कुंड का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है और श्रद्धालु यहां आकर पूजा-अर्चना करते हैं।

क्या है कछुआ कुंड के दर्शन का महत्व?

मान्यता है कि कछुआ कुंड के दर्शन करने और श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं तथा सुख-समृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति का आशीर्वाद मिलता है। कई श्रद्धालु कुंड में रहने वाले कछुओं को आटे की गोलियां या अन्य अनुमत खाद्य सामग्री अर्पित करते हैं। हालांकि, मंदिर प्रशासन द्वारा जारी नियमों का पालन करना जरूरी होता है।

कामाख्या यात्रा में जरूर देखें यह स्थान

कामाख्या मंदिर आने वाले श्रद्धालु मुख्य गर्भगृह के दर्शन के साथ कछुआ कुंड भी देखने पहुंचते हैं। शांत वातावरण और धार्मिक महत्व के कारण यह स्थान श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बना रहता है। अंबुबाची मेले और अन्य प्रमुख धार्मिक अवसरों पर यहां बड़ी संख्या में भक्त पहुंचते हैं।

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