जगन्नाथ मंदिर की अनोखी परंपरा: जन्माष्टमी की पूर्व संध्या पर जब स्वयं माता देवकी का रूप धरते हैं महाप्रभु
क्या आपने कभी ऐसी धार्मिक मान्यता के बारे में सुना है, जिसमें भगवान स्वयं माता का रूप धारण कर गर्भधारण करते हैं और संतान को जन्म देने की प्रसव पीड़ा सहते हैं? सुनने में यह परंपरा जितनी अनोखी लगती है, आस्था की दुनिया में इसका भाव उतना ही गहरा माना जाता है।
जन्माष्टमी से ठीक एक शाम पहले पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में एक विशेष अनुष्ठान किया जाता है, जिसे 'गर्भोदक बंदापना नीति' कहा जाता है। मंदिर की परंपरा के अनुसार, इस दौरान महाप्रभु जगन्नाथ को माता के भाव में माना जाता है और भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य से जुड़ी विशेष धार्मिक प्रक्रिया संपन्न होती है।
जगन्नाथ मंदिर के पुजारी बृजमोहन पंडित ने इस अनुष्ठान से जुड़ी परंपराओं के बारे में जानकारी साझा की।
जगन्नाथ में माता और पिता दोनों के तत्व की मान्यता
पुरी की धार्मिक परंपराओं में महाप्रभु जगन्नाथ को केवल एक अवतार नहीं, बल्कि परब्रह्म और 'अवतारी' माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान के विभिन्न अवतारों का मूल स्वरूप महाप्रभु में ही समाहित है।
ऐसे में जब श्रीकृष्ण के जन्म से जुड़ी लीला का प्रसंग आता है, तो जगन्नाथ स्वयं माता और पिता दोनों के भाव का प्रतीक माने जाते हैं। मान्यता है कि जन्माष्टमी से एक शाम पहले भगवान जगन्नाथ माता देवकी के भाव में श्रीकृष्ण को अपने गर्भ में धारण करते हैं।
इसी धार्मिक भावना के तहत मंदिर में विशेष अनुष्ठान की शुरुआत होती है।
शाम की आरती के बाद शुरू होती है विशेष नीति
जन्माष्टमी से एक दिन पहले शाम की 'संध्या धूप' आरती पूरी होने के बाद मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। सेवायत महाप्रभु जगन्नाथ की विशेष आरती करते हैं और गर्भ की रक्षा तथा भगवान श्रीकृष्ण के सुरक्षित प्राकट्य के लिए वंदना की जाती है।
इसी विशेष प्रक्रिया को 'गर्भोदक बंदापना' कहा जाता है।
इसके बाद गर्भगृह के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दौरान महाप्रभु को मातृत्व के भाव में एकांत दिया जाता है और किसी तरह का व्यवधान नहीं होने दिया जाता।
प्रसव पीड़ा से राहत के लिए लगता है 'जेऊठ भोग'
इस परंपरा का सबसे भावुक पहलू 'जेऊठ भोग' से जुड़ा है। मान्यता के अनुसार, गर्भगृह के कपाट बंद होने के बाद महाप्रभु को विशेष भोग अर्पित किया जाता है।
इसे 'जेऊठ भोग' कहा जाता है। मंदिर की परंपरा के मुताबिक, यह विशेष आहार औषधीय सब्जियों और जड़ी-बूटियों से तैयार किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं में इसे प्रसव पीड़ा के दौरान मां को संबल देने वाले पारंपरिक आहार से जोड़ा जाता है।
यह पूरी प्रक्रिया भगवान के मातृत्व भाव और भक्तों के वात्सल्य को दर्शाने वाली मानी जाती है।
मध्यरात्रि में होती है श्रीकृष्ण के जन्म की लीला
अष्टमी की मध्यरात्रि में इस विशेष धार्मिक प्रक्रिया का अगला चरण पूरा होता है। इसके बाद बाल गोपाल के जन्म से जुड़ी नाल-छेदन की परंपरा निभाई जाती है।
पुरी की इस अनूठी परंपरा को एक स्थानीय कहावत के जरिए भी समझाया जाता है—
“आजी माता, काली पुअ, परदिन पुणी माता”, यानी आज जो माता हैं, अगले दिन पुत्र और फिर उसके बाद दोबारा माता के भाव में।
यह कहावत महाप्रभु जगन्नाथ की उस लीला को दर्शाती है, जिसमें भगवान के अलग-अलग स्वरूप और भाव एक-दूसरे में समाहित माने जाते हैं।
जन्माष्टमी पर मनाया जाता है कान्हा का जन्मोत्सव
इस विशेष अनुष्ठान के बाद जन्माष्टमी के अवसर पर श्रीमंदिर में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की लीला उत्साह और धार्मिक विधि-विधान के साथ मनाई जाती है।
इस परंपरा में सबसे खास बात यह मानी जाती है कि जिन महाप्रभु जगन्नाथ को जगत का पालनहार माना जाता है, वही एक मां के भाव को धारण कर बाल गोपाल के प्राकट्य की लीला से जुड़ते हैं।
पुरी की यह अनोखी धार्मिक परंपरा भगवान जगन्नाथ की बहुआयामी स्वरूप-कल्पना और भक्तों की गहरी आस्था को दर्शाती है।

