Samachar Nama
×

गरुड़ पुराण में बताया है कि चिता की परिक्रमा क्यों करते हैं?
 

गरुड़ पुराण में बताया है कि चिता की परिक्रमा क्यों करते हैं?

हिंदू धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक कई तरह के संस्कारों का उल्लेख मिलता है। इनमें अंतिम संस्कार को बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद जब अंतिम संस्कार किया जाता है, तो परिवार और करीबी लोग कई धार्मिक परंपराओं का पालन करते हैं। इन्हीं में से एक है चिता की परिक्रमा करना। आपने अक्सर देखा होगा कि अंतिम संस्कार के समय शव को चिता पर रखने के बाद परिजन चिता के चारों ओर परिक्रमा करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर चिता की परिक्रमा क्यों की जाती है और इसके पीछे क्या धार्मिक मान्यता है?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अंतिम संस्कार के दौरान किए जाने वाले प्रत्येक कर्म का एक विशेष अर्थ बताया गया है। गरुड़ पुराण में मृत्यु, आत्मा की यात्रा और अंतिम संस्कार से जुड़े कई विषयों का विस्तार से वर्णन मिलता है। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में अंतिम संस्कार की विधि में कुछ अंतर भी देखने को मिलता है।

चिता की परिक्रमा का क्या है अर्थ?

सनातन परंपरा में परिक्रमा सामान्यतौर पर किसी देवता या पवित्र स्थान के सम्मान और श्रद्धा का प्रतीक मानी जाती है। लेकिन अंतिम संस्कार के दौरान चिता की परिक्रमा सामान्य पूजा-पद्धति से अलग मानी जाती है। कई धार्मिक व्याख्याओं में इसे मृत व्यक्ति के प्रति अंतिम सम्मान और विदाई से जोड़कर देखा जाता है।

अंतिम यात्रा में शामिल लोग चिता के चारों ओर घूमकर मृत व्यक्ति के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। यह परिवार और समाज की ओर से उस व्यक्ति को दी जाने वाली अंतिम विदाई का प्रतीक माना जाता है। इसके साथ ही यह स्वीकार करने का भाव भी माना जाता है कि शरीर नश्वर है और एक दिन प्रत्येक जीव को इस संसार को छोड़ना पड़ता है।

उल्टी दिशा में क्यों की जाती है परिक्रमा?

धार्मिक परंपरा में अंतिम संस्कार के समय चिता की परिक्रमा सामान्य मंदिर की परिक्रमा की तरह नहीं की जाती। कई हिंदू परंपराओं में इसे अपसव्य या वामावर्त दिशा में करने की बात कही गई है। इसके पीछे यह मान्यता है कि सामान्य धार्मिक अनुष्ठानों में देवताओं के लिए दक्षिणावर्त परिक्रमा की जाती है, जबकि मृत्यु से जुड़े संस्कारों में अलग दिशा अपनाई जाती है।

इसे जीवन और मृत्यु के बीच अंतर को दर्शाने वाला प्रतीक भी माना जाता है। जहां शुभ धार्मिक कार्यों में दक्षिणावर्त गति मंगल और सकारात्मकता से जुड़ी होती है, वहीं अंतिम संस्कार में वामावर्त परिक्रमा सांसारिक जीवन से विदाई का संकेत मानी जाती है।

Share this story

Tags