मंगला गौरी व्रत की शुरुआत के बाद कितने साल निभाएं परंपरा, जानें अवधि और उद्यापन की धार्मिक मान्यता
सावन महीने के मंगलवार को रखा जाने वाला मंगला गौरी व्रत माता गौरी और भगवान शिव को समर्पित माना जाता है। यह व्रत खासतौर पर नवविवाहित महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मंगला गौरी व्रत करने से दांपत्य जीवन में सुख-शांति, सौभाग्य और पति की दीर्घायु की कामना की जाती है। हर साल सावन में आने वाले मंगलवारों को यह व्रत रखा जाता है। साल 2026 में मंगला गौरी व्रत 4, 11, 18 और 25 अगस्त को पड़ रहे हैं।
कितने साल करना चाहिए मंगला गौरी व्रत
धार्मिक परंपरा के अनुसार, विवाह के बाद मंगला गौरी व्रत लगातार पांच वर्षों तक करने की मान्यता है। इस दौरान हर सावन महीने में आने वाले मंगलवार को व्रत और माता गौरी की पूजा की जाती है। कई परंपराओं में इसे कुल 16 या 20 मंगलवार तक करने की भी मान्यता मिलती है, क्योंकि सावन में चार या पांच मंगलवार हो सकते हैं। मान्यता के अनुसार, विवाह के बाद आने वाले पहले सावन में महिला यह व्रत अपने मायके में करती है। इसके बाद अगले चार वर्षों तक ससुराल में रहकर व्रत करने की परंपरा बताई गई है। पांच वर्ष पूरे होने के बाद व्रत का उद्यापन किया जाता है।
पांचवें साल किया जाता है उद्यापन
मंगला गौरी व्रत की पांच साल की परंपरा पूरी होने के बाद पांचवें वर्ष सावन के अंतिम मंगलवार को उद्यापन करने की मान्यता है। उद्यापन को व्रत के समापन का धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है। कुछ धार्मिक परंपराओं में उद्यापन के दौरान माता गौरी की विशेष पूजा, सुहाग सामग्री का पूजन और विवाहित महिलाओं को सम्मान देने की परंपरा बताई गई है।
पूजा में 16 संख्या का महत्व
मंगला गौरी व्रत की पूजा में 16 संख्या का विशेष महत्व बताया जाता है। कई परंपराओं में माता गौरी को 16 प्रकार की पूजन सामग्री और श्रृंगार सामग्री अर्पित की जाती है। आटे से बने दीपक में 16 बत्तियां जलाने की परंपरा भी कुछ स्थानों पर प्रचलित है। पूजा के बाद व्रत कथा का पाठ या श्रवण किया जाता है और माता गौरी की आरती उतारी जाती है।
व्रत से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मंगला गौरी व्रत करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। महिलाएं पति की लंबी आयु, परिवार की सुख-समृद्धि और संतान सुख की कामना से भी यह व्रत करती हैं। हालांकि ये फल धार्मिक आस्था और मान्यताओं पर आधारित हैं।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मंगला गौरी व्रत की अवधि और उद्यापन की परंपरा अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में थोड़ी अलग हो सकती है। इसलिए व्रत शुरू करने से पहले अपने परिवार की परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार विधि जानना उचित माना जाता है।कुल मिलाकर, मंगला गौरी व्रत को विवाह के बाद पांच वर्षों तक करने की परंपरा सबसे अधिक बताई जाती है। पहले वर्ष मायके और अगले चार वर्षों में ससुराल में व्रत करने के बाद पांचवें वर्ष उद्यापन किया जाता है। यह व्रत माता गौरी और भगवान शिव के प्रति श्रद्धा, वैवाहिक सुख और सौभाग्य की कामना से जुड़ा धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है।

