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हल षष्ठी 2026: 2 सितंबर को रखा जाएगा हरछठ व्रत, जानें पूजा विधि, महत्व और इस दिन क्या खाया जाता है

हल षष्ठी 2026: 2 सितंबर को रखा जाएगा हरछठ व्रत, जानें पूजा विधि, महत्व और इस दिन क्या खाया जाता है

संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना के लिए रखा जाने वाला हल षष्ठी या हरछठ व्रत इस साल 2 सितंबर 2026, बुधवार को रखा जाएगा। इसे हल छठ, ललही छठ और बलदेव छठ के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम को समर्पित है। बलराम जी का प्रमुख अस्त्र हल माना जाता है, इसलिए इस व्रत में हल और कृषि से जुड़ी परंपराओं का विशेष महत्व है।

2 सितंबर को ही क्यों रखा जाएगा व्रत?

पंचांग गणना के अनुसार भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि 2 सितंबर की सुबह 6:12 बजे शुरू होकर 3 सितंबर की सुबह 4:25 बजे तक रहेगी। इसी वजह से हल षष्ठी का व्रत 2 सितंबर को ही रखा जाएगा। उपलब्ध गणना के अनुसार इस दिन सुबह स्नान और पूजा के बाद व्रत का संकल्प लिया जाता है।

संतान की सलामती के लिए रखा जाता है व्रत

हरछठ का व्रत मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से रखती हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान बलराम और षष्ठी माता की पूजा करने से बच्चों पर उनका आशीर्वाद बना रहता है।

कई क्षेत्रों में इस दिन बलराम जी की जन्मकथा और हल षष्ठी व्रत कथा सुनने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं में बलराम को शक्ति, कृषि और हल से जोड़ा गया है।

ऐसे करें हल षष्ठी की पूजा

हल षष्ठी के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा स्थल को साफ करें। परंपरा के अनुसार झरबेरी, पलाश और गूलर की शाखाओं को एक साथ बांधकर पूजा स्थल पर स्थापित किया जाता है। इन्हें कई स्थानों पर हरछठ का प्रतीक माना जाता है।

इसके बाद भगवान गौरी-गणेश, शिव और कार्तिकेय की स्थापना कर पूजा की जाती है। कुछ परंपराओं में षष्ठी माता या छठी मैया की भी पूजा की जाती है। पूजा में चंदन, रोली, अक्षत, फूल, फल और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। इसके बाद दीप जलाकर आरती की जाती है और हल षष्ठी की कथा सुनी या पढ़ी जाती है।

हल से जुते अन्न का सेवन क्यों नहीं करते?

इस व्रत में हल से जुती हुई जमीन से पैदा हुए अनाज का सेवन न करने की परंपरा है। इसका संबंध भगवान बलराम के हल से माना जाता है। कई क्षेत्रों में व्रती महिलाएं भैंस का दूध और दही, फल तथा ऐसे खाद्य पदार्थ ग्रहण करती हैं जो स्थानीय परंपरा के अनुसार व्रत में मान्य हों।

इस दिन सात प्रकार के भुने हुए अनाज यानी सतनजा को भी पूजा में अर्पित करने की परंपरा कुछ क्षेत्रों में प्रचलित है। हालांकि खान-पान के नियम अलग-अलग क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार बदल सकते हैं।

हल षष्ठी का धार्मिक महत्व

हल षष्ठी को भगवान बलराम की आराधना का पर्व माना जाता है। बलराम जी को हलधर और बलभद्र जैसे नामों से भी जाना जाता है। इसलिए इस दिन हल की पूजा के साथ कृषि और अन्न से जुड़े नियमों का पालन करने की परंपरा विकसित हुई।

व्रत के अंत में पूजा, कथा श्रवण और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य करने को भी शुभ माना जाता है।

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