Dhanteras 2026: दो दिन मनाई जाएगी धनतेरस, सोना-चांदी से लेकर बर्तन खरीदने तक जानें शुभ मुहूर्त और परंपराओं का महत्व
दीपावली से पहले मनाया जाने वाला धनतेरस का त्योहार इस बार दो दिनों तक मनाया जा रहा है। त्रयोदशी तिथि 6 नवंबर से शुरू होकर 7 नवंबर तक रहेगी। इस अवसर पर सोना-चांदी, बर्तन, वाहन और नई संपत्ति खरीदना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि धनतेरस पर खरीदारी करने से घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है।
इस बार दोनों दिन खरीदारी और पूजा के लिए चार-चार शुभ चौघड़िया मुहूर्त बताए गए हैं। प्रत्येक मुहूर्त लगभग डेढ़ घंटे का होता है। हालांकि, खरीदारी का सही समय स्थानीय पंचांग और शहर के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
धनतेरस पर क्यों खरीदे जाते हैं बर्तन और सोना-चांदी?
धनतेरस पर बर्तन और आभूषण खरीदने की परंपरा का संबंध समुद्र मंथन की पौराणिक कथा से जोड़ा जाता है। श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान देवी लक्ष्मी प्रकट हुई थीं। उनके आगमन पर नदियां सोने के कलश लेकर पहुंची थीं, जबकि भगवान विश्वकर्मा ने देवी को आभूषण भेंट किए थे।
इसी धार्मिक मान्यता के आधार पर धनतेरस पर सोना-चांदी और नए बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है। लोग अपनी क्षमता के अनुसार चांदी के सिक्के, आभूषण, पीतल और तांबे के बर्तन खरीदते हैं।
धनतेरस पर धनिया और झाड़ू खरीदने का क्या है महत्व?
धनतेरस पर धनिया के साबुत बीज खरीदने की भी पुरानी परंपरा है। पद्म पुराण और स्कंद पुराण में देवी लक्ष्मी को अन्न और धान्य की वृद्धि से जोड़कर देखा गया है। धनिया के बीज बोने पर नए पौधे निकलते हैं, इसलिए इन्हें धन और आमदनी में बढ़ोतरी का प्रतीक माना जाता है।
वहीं, इस दिन झाड़ू खरीदने की परंपरा भी प्रचलित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, झाड़ू घर की गंदगी के साथ दरिद्रता और नकारात्मकता को बाहर निकालने का प्रतीक है। हालांकि, झाड़ू खरीदने की इस परंपरा का किसी प्रमुख धार्मिक ग्रंथ में स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता।
समुद्र मंथन से निकले थे लक्ष्मी के सात प्रतीक
श्रीमद्भागवत महापुराण में समुद्र मंथन की कथा का विस्तार से वर्णन मिलता है। मान्यता के अनुसार, देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए क्षीरसागर का मंथन किया था। इस दौरान सुरभि गाय, उच्चैःश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ और पद्मराग मणि, पारिजात वृक्ष और अप्सराएं प्रकट हुईं। इसके बाद देवी लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ।
कथा के अनुसार, देवी लक्ष्मी को इंद्र ने आसन दिया। नदियां सोने के कलशों में जल लेकर आईं और ऋषियों ने वैदिक मंत्रों के साथ उनका अभिषेक किया। दिशाओं के हाथियों ने भी देवी को स्नान कराया। इसके बाद देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को अपना पति चुना।
करीब 200 साल पहले भी होती थी सिक्कों की पूजा
धनतेरस पर धन और सिक्कों की पूजा करने की परंपरा काफी पुरानी मानी जाती है। ब्रिटिश इतिहासकार जेम्स टॉड ने वर्ष 1832 में प्रकाशित अपनी किताब 'एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान' में कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी पर सिक्कों की पूजा का उल्लेख किया था।
उन्होंने लिखा था कि इस दिन लोग सिक्कों को देवी लक्ष्मी का प्रतीक मानकर उनकी पूजा करते थे। यह परंपरा विशेष रूप से व्यापारी समुदाय में प्रचलित थी। जेम्स टॉड ने 1818 से 1822 के बीच राजस्थान में रहकर यहां की परंपराओं और इतिहास का अध्ययन किया था।
इससे पता चलता है कि करीब दो शताब्दी पहले भी धनतेरस पर धन की पूजा और समृद्धि की कामना का विशेष महत्व था। आज भी लोग इस दिन नई वस्तुएं खरीदकर देवी लक्ष्मी और भगवान कुबेर से सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।

