देवउठनी एकादशी जिसे प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है, हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण व्रत है। इस पावन दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णु चार महीने की लंबी योग निद्रा से जाग्रत होते हैं और पुन: सृष्टि के संचालन का कार्यभार संभालते हैं। इस दिन ही शुभ और मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाती है। इस बार देवउठनी एकादशी पर भद्रा का साया रहने वाला है। भद्रा का वास इस दिन पृथ्वी लोक पर रहने वाला है। वैदिक ज्योतिष में भद्रा को अशुभ माना जाता है। मान्यता है कि भद्रा काल में किए गए कार्यों का उत्तम फल प्राप्त नहीं होता है, इसलिए इस समय पूजा-पाठ या अन्य किसी भी मंगल कार्य को करने से बचना चाहिए। देवउठनी एकादशी के दिन लोग शाम के समय भगवान श्रीहरि की पूजा करते हैं और उन्हें मंगल-गीत गाकर जगाते हैं। कुछ जगहों पर इस दिन तुलसी विवाह की भी परंपरा निभाई जाती है। ऐसे में इस दिन भद्रा की अड़चन होने से लोगों के मन में प्रश्न उठ रहा है कि क्या देवउठनी एकादशी पर पूजा के नियम बदलेंगे या फिर सामान्य रूप से पूजा की जा सकेगी। जानें पंडित जी का मत।
देवउठनी एकादशी पर कब पूजा करना उत्तम:
पंडित नरेंद्र उपाध्याय बताते हैं कि इस साल गृहस्थ देवउठनी एकादशी व्रत 20 नवंबर 2026 को रखेंगे। इस दिन भद्रा शाम 07 बजकर 01 मिनट से शुरू होगी और अगले दिन 21 नवंबर 2026 को सुबह 06 बजकर 32 मिनट पर समाप्त होगी। भद्रा का वास पृथ्वी लोक पर है, जिसे अशुभ माना जाता है। पृथ्वी लोक की भद्रा में किसी भी शुभ, मांगलिक या नया कार्य वर्जित माना जाता है। देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा भद्रा प्रारंभ होने से पहले और सूर्यास्त के बाद की जा सकती है। अगर किसी कारणवश भद्रा से पूर्व पूजा करना संभव नहीं है तो किसी भी शुभ चौघड़िया मुहूर्त में श्री हरि का पूजन किया जा सकता है। इस दिन पूजन का सबसे उत्तम समय गोधूलि मुहूर्त शाम 05:22 बजे से शाम 05:49 बजे तक रहेगा।
देवउठनी एकादशी पर क्या बदलेंगे पूजा नियम:
पंडित नरेंद्र उपाध्याय बताते हैं कि देवउठनी एकादशी पर भद्रा का बहुत विशेष प्रभाव नहीं रहेगा क्योंकि पूजन भद्रा से पहले संपन्न किया जा सकता है, इसलिए पूजन नियमों में बदलाव नहीं होगा। उनका कहना है कि भद्रा काल में पूजन और शुभ कार्यों के लिए नियम मुख्य रूप से भद्रा के वास (स्थान) और उसकी स्थिति के आधार पर बदलते हैं। ज्योतिष में भद्रा को अनिष्ट फल प्रदाता माना जाता है। अगर पृथ्वी लोक पर भद्रा रहती है और इस दौरान कोई बेहद जरूरी कार्य और पूजन करना ही पड़े तो भद्रा के अंगों को देखा जाता है। भद्रा के शुरुआती समय को सबसे ज्यादा अशुभ माना जाता है। इस दौरान शुभ कार्यों की सख्त मनाही है। भद्रा का अंतिम भाग (पुच्छ) शुभ और लाभकारी माना जाता है। अगर किसी कारणवश भद्रा में पूजा रोकना संभव नहीं हो, तो भद्रा पुच्छ के समय में नियम शिथिल हो जाते हैं और पूजा की जा सकती है।
देवउठनी एकादशी पर पूजन के शुभ मुहूर्त:
एकादशी तिथि 20 नवंबर 2026 को सुबह 07 बजकर 16 मिनट पर प्रारंभ होगी और 21 नवंबर 2026 को सुबह 06 बजकर 32 मिनट पर समाप्त होगी। इस दिन पूजन का अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 43 मिनट से दोपहर 12 बजकर 31 बजे तक रहेगा। प्रदोष काल शाम 05 बजकर 25 बजे से रात 08 बजकर 06 बजे तक रहेगा।

