25 सितंबर तक बरसेंगी बप्पा की कृपा! जानिए जीवन की बुराइयों और विकारों को दूर करने के लिए गणेश जी के किस रूप को पूजें
इन दिनों देशभर में गणेश उत्सव की धूम है। गणपति पूजा का यह पर्व 25 सितंबर तक चलेगा। गणेश उत्सव के दौरान भगवान गणेश के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा करने का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान गणेश ने भी समय-समय पर अलग-अलग अवतार लेकर अधर्म और बुराइयों का नाश किया। गणेश जी के इन स्वरूपों को मनुष्य के अंदर मौजूद काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, ईर्ष्या, अहंकार और अज्ञान जैसी बुराइयों से भी जोड़ा जाता है।
मान्यता है कि गणपति के अलग-अलग स्वरूपों की आराधना करने से व्यक्ति इन नकारात्मक भावनाओं पर नियंत्रण पाने की प्रेरणा प्राप्त कर सकता है। आइए जानते हैं गणेश जी के कौन-कौन से अवतार किन असुरों से जुड़े हैं और उनका धार्मिक महत्व क्या माना जाता है।
वक्रतुंड गणेश दूर करते हैं ईर्ष्या
पौराणिक कथा के अनुसार, मत्सरासुर ने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से दीक्षा लेकर देवताओं को पराजित कर दिया था। उसके दो पुत्र सुंदरप्रिय और विषयप्रिय भी अत्याचारी थे। उनके आतंक को समाप्त करने के लिए भगवान गणेश ने वक्रतुंड रूप धारण किया।
वक्रतुंड का अर्थ टेढ़ी सूंड वाले गणेश से है। भगवान वक्रतुंड ने मत्सरासुर के दोनों पुत्रों का वध किया और बाद में मत्सरासुर को भी पराजित किया। इसके बाद मत्सरासुर गणेश जी का भक्त बन गया।
‘मत्सर’ का संबंध ईर्ष्या और जलन से माना जाता है। इसी वजह से गणेश जी के वक्रतुंड स्वरूप को ईर्ष्या जैसी भावना से मुक्ति की प्रेरणा से जोड़ा जाता है।
एकदंत गणेश से जुड़ा है मदासुर का वध
कथा के अनुसार, मदासुर ने शुक्राचार्य से दीक्षा लेकर देवताओं को पराजित कर दिया था। उसके आतंक से परेशान होकर देवताओं ने भगवान गणेश से सहायता मांगी।
तब गणेश जी ने एकदंत स्वरूप में अवतार लिया। एकदंत का अर्थ है एक दांत वाले गणेश। भगवान एकदंत ने मदासुर को पराजित किया और देवताओं को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई।
‘मद’ का संबंध घमंड, नशे या अपनी शक्ति के अहंकार से जोड़ा जाता है। इसलिए एकदंत गणेश की पूजा को इन बुराइयों से दूर रहने की धार्मिक मान्यता से जोड़ा जाता है।
मोह से बचने के लिए महोदर गणेश
पौराणिक मान्यता के अनुसार, तारकासुर के वध के बाद मोहासुर ने देवताओं की परेशानियां बढ़ा दी थीं। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान गणेश ने महोदर रूप में अवतार लिया।
महोदर का अर्थ बड़े पेट वाले गणेश से है। कथा के अनुसार, महोदर गणेश के प्रभाव से मोहासुर ने अपना विरोध छोड़ दिया और भगवान का भक्त बन गया।
‘मोहासुर’ को मोह का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, महोदर गणेश की आराधना व्यक्ति को अनावश्यक मोह और आसक्ति से ऊपर उठने की प्रेरणा देती है।
विकट गणेश से जुड़ी है कामासुर की कथा
कामासुर ने भगवान शिव से वरदान प्राप्त करने के बाद देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था। उसके बढ़ते आतंक से परेशान देवताओं ने भगवान गणेश से रक्षा की प्रार्थना की।
तब गणपति ने विकट रूप धारण किया। विकट स्वरूप को कठिन परिस्थितियों और बाधाओं से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है। भगवान विकट ने कामासुर को पराजित कर देवताओं की रक्षा की।
‘कामासुर’ को काम और अनियंत्रित इच्छाओं का प्रतीक माना जाता है। गणेश जी की आराधना को मन पर संयम रखने और गलत इच्छाओं से बचने की प्रेरणा से जोड़ा जाता है।
लालच से बचने के लिए गजानन की पूजा
पौराणिक कथा के अनुसार, लोभासुर ने शुक्राचार्य से दीक्षा लेकर भगवान शिव को प्रसन्न किया और वरदान प्राप्त किया। इसके बाद उसने तीनों लोकों में अपना प्रभाव स्थापित कर लिया।
सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान गणेश ने गजानन रूप धारण किया। गजानन यानी हाथी के समान मुख वाले गणेश। कथा के अनुसार, गजानन के स्वरूप को देखकर लोभासुर ने युद्ध किए बिना ही अपनी पराजय स्वीकार कर ली और भगवान गणेश का भक्त बन गया।
‘लोभासुर’ को लालच का प्रतीक माना जाता है। इस कथा के माध्यम से नि:स्वार्थ भाव और संतोष का महत्व बताया जाता है।
क्रोध पर नियंत्रण की सीख देते हैं लंबोदर गणेश
कथा के अनुसार, क्रोधासुर को सूर्यदेव से वरदान प्राप्त था। वरदान मिलने के बाद उसने देवताओं को पराजित कर दिया। परेशान होकर देवताओं ने भगवान गणेश की शरण ली।
तब गणपति ने लंबोदर रूप धारण किया। लंबोदर का अर्थ बड़े और लंबे उदर वाले गणेश से है। भगवान लंबोदर के प्रभाव से क्रोधासुर पाताल लोक चला गया और देवताओं को उसके आतंक से मुक्ति मिली।
‘क्रोधासुर’ को गुस्से का प्रतीक माना जाता है। गणेश जी की भक्ति से मन को शांत रखने और क्रोध पर नियंत्रण पाने की प्रेरणा मिलने की धार्मिक मान्यता है।
अहंकार दूर करने से जुड़ा है धूम्रवर्ण गणेश का स्वरूप
पौराणिक कथा में बताया जाता है कि एक बार सूर्यदेव की छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई, जिसका नाम अहम या अहंतासुर बताया गया है। शुक्राचार्य की आज्ञा से अहंतासुर ने तीनों लोकों में अत्याचार करना शुरू कर दिया।
उसके आतंक का अंत करने के लिए भगवान गणेश ने धूम्रवर्ण अवतार लिया। धूम्रवर्ण का अर्थ धुएं के समान रंग वाले गणेश से है। भगवान धूम्रवर्ण ने अहंतासुर को पराजित किया। इसके बाद अहंतासुर भी गणेश जी का भक्त बन गया।
‘अहंतासुर’ को अहंकार का प्रतीक माना जाता है। इस कथा के जरिए विनम्रता और अहंकार से दूर रहने का संदेश दिया जाता है।
गणेश जी के अलग-अलग स्वरूप देते हैं सद्गुणों की सीख
गणेश जी के इन अवतारों से जुड़ी पौराणिक कथाओं में अलग-अलग बुराइयों पर विजय पाने का संदेश मिलता है। वक्रतुंड को ईर्ष्या, एकदंत को मद, महोदर को मोह, विकट को काम, गजानन को लोभ, लंबोदर को क्रोध और धूम्रवर्ण को अहंकार से जोड़ा जाता है।
गणेश उत्सव के दौरान इन स्वरूपों की पूजा और उनसे जुड़ी कथाओं का स्मरण श्रद्धालुओं को संयम, संतोष, विनम्रता और सदाचार का संदेश देता है।

