ज्योतिष न्यूज़ डेस्क: धार्मिक शास्त्रों और पुराणों में भगवान शिव के पुत्र कार्तिके और श्री गणेश का वर्णन मिलता है और अधिकतर लोग भोलेनाथ के दो पुत्रों के बारे में जानते हैं लेकिन बहुत कम ही लोग होंगे जो शिव के तीसरे पुत्र जालंधर के बारे में कुछ जानते होंगे तो आज हम आपको एक पौराणिक कथा के जरिए भगवान शिव के पुत्र जालंधर की जन्म कथा के बारे में विस्तार से बता रहे हैं तो आइए जानते हैं।

पौराणिक कथा के अनुसार—
एक बार इंद्र देव और गुरु बृहस्पति शिव के दर्शन के लिए कैलाश पहुंचते हैं तभी शिव ने दोनोंकी परीक्षा लेनी चाही शिव भेष बदलकर अवधूत बन गए। इस रूप में शिव बहुत ही भयावह लग रहे थे शिव जी इंद्र और बृहस्पति के मार्ग में खड़े हो गए तभी अवधूत को देख इंद्र और बृहस्पति हैरान रह गए। इंद्र को अपने देवराज होने पर बहुत घमंड था इसलिए उन्होंने अहंकार और क्रोध में शिव से पूछा तुम कौन हो क्या शिव अभी कैलाश पर्वत पर निवास कर रहे हैं हम उनसे मिलने आए हैं इंद्र की यह बातें सुन शिव चुपचाप खडे रहे। इस तरह से इंद्र को और अधिक क्रोध आ गया उन्हें लगा एक साधारण अवधूत द्वारा उनका अपमान हो रहा है इससे इंद्र और अधिक क्रोधित हो गए उन्होंने अवधूत से कहा कि मेरे बार बार पूछने पर भी तुमने कुछ न कहकर मेरा अपमान किया है इसके लिए तुम्हें दंड जरूर मिलेगा और इंद्र ने अवधूत पर प्रहार करने के लिए अपना व्रज उठा लिया।

लेकिन अवधूत के शरीर पर धधकती ज्वाला और चेहरे पर क्रोध देख बृहस्पति समझ गए कि ऐसा प्रचंड रूप केवल शिव का ही हो सकता है शिव के इस विकराल रूप और क्रोध से इंद्र देव का विनाश न हो जाए इसलिए बृहस्पति शिव के क्रोध को कम करने के लिए शिवस्तुति का पाठ करने लगे। इतना ही नहीं बृहस्पति ने इंद्र को शिव के चरणों में लेटा दिया जिससे इंद्र के प्राणों की रक्षा हो सकें। लेकिन महादेव के क्रोध में होने के कारण उनके मस्तिष्क से ज्वाला निकल रही थी तब बृहस्पति ने शिव से कहा इंद्र आपके चरणों में हैं

अब आप अपने माथे से निकलने वाली इस ज्वाला को कहीं और स्थान प्रदान करें और इंद्र के प्राण की रक्षा करें कहा जाता है कि महादेव की तीसरी आंख से निकलने वाली ज्वाला इतनी अधिक तीव्र थी कि न इसे जीव और न ही देवता सहन कर सकते थे तब शिव शंकर ने इस तेज को एक समुंद में फेंक दिया ज्वाला को समुंद में फेंकते ही एक बालक की उत्पत्ति हुई जिसे शिवपुत्र जालंधर के नाम से जाना गया है शिव के तेज से जन्मे बालक का नामकरण भगवान ब्रह्मा द्वारा ही जालंधर रखा गया।


