☰
×

World News: श्रीलंका के पास फंसे ईरान के 19 जहाज, खाना-पानी और ईंधन की कमी; अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से मदद पर असमंजस

 

श्रीलंका के तट के पास अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में ईरान के 19 जहाज फंसे होने की खबर है। इन जहाजों पर खाने-पीने के सामान, पानी और ईंधन की कमी बताई जा रही है। इसके बावजूद श्रीलंका सरकार उनकी सहायता को लेकर सावधानी बरत रही है। इसकी प्रमुख वजह अमेरिका के प्रतिबंधों का संभावित खतरा है।

श्रीलंका के सामने एक तरफ जहाजों पर मौजूद लोगों की जरूरतों को पूरा करने का सवाल है, तो दूसरी तरफ अमेरिका के साथ आर्थिक और कारोबारी संबंधों को बनाए रखने की चुनौती है। हालांकि, श्रीलंका के अधिकारियों के अनुसार, अमेरिका ने अब तक जहाजों की मदद करने पर किसी कार्रवाई की आधिकारिक चेतावनी नहीं दी है।

श्रीलंका के तट से 24 समुद्री मील दूर हैं जहाज

श्रीलंका के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता थुषारा रोड्रिगो के मुताबिक, ईरान के ये जहाज श्रीलंका के तट से लगभग 24 समुद्री मील दूर मौजूद हैं। सरकार किसी भी कदम से पहले राष्ट्रीय हितों और संभावित अंतरराष्ट्रीय परिणामों पर विचार कर रही है।

ईरानी जहाजों को जरूरी सामान और दूसरी सेवाएं देने वाली कंपनियां भी अमेरिकी प्रतिबंधों के संभावित जोखिम को लेकर सतर्क बताई जा रही हैं। इस वजह से सहायता उपलब्ध कराने की प्रक्रिया जटिल हो सकती है।

होर्मुज में नाकेबंदी के बाद फंसे ईरानी तेल टैंकर

श्रीलंका के विदेश मंत्री विजिता हेराथ ने संडे टाइम्स को बताया कि फंसे हुए जहाज ईरान के तेल टैंकर हैं। उनके मुताबिक, होर्मुज जलडमरूमध्य में अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी दोबारा शुरू होने के बाद कई ईरानी जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है।

होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ने वाला अहम समुद्री रास्ता है। वैश्विक तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। यहां जहाजों की आवाजाही बाधित होने से ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर असर पड़ सकता है।

श्रीलंका के तट के पास अमेरिकी हमले में डूबा था ईरानी युद्धपोत

ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के दौरान मार्च में श्रीलंका के तट के पास ईरानी नौसैनिक जहाज IRIS Dena डूब गया था। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, यह जहाज श्रीलंका के गाले शहर से लगभग 19 समुद्री मील दूर डूबा था। घटना में बड़ी संख्या में ईरानी नौसैनिकों की मौत हुई थी।

रिपोर्टों के मुताबिक, जहाज भारत के निमंत्रण पर आयोजित नौसैनिक अभ्यास में हिस्सा लेने के बाद ईरान लौट रहा था। इस घटना ने क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा और ईरान-अमेरिका तनाव को लेकर चिंताएं बढ़ा दी थीं।

अमेरिका और ईरान, दोनों से हैं श्रीलंका के कारोबारी संबंध

श्रीलंका के लिए ईरानी जहाजों की मदद को लेकर फैसला लेना आसान नहीं है। देश आर्थिक संकट से उबरने की कोशिश कर रहा है और उसके अमेरिका तथा ईरान, दोनों के साथ कारोबारी संबंध हैं।

आर्थिक संकट के दौरान श्रीलंका को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से सहायता दिलाने और आर्थिक सुधारों में अमेरिका की भूमिका रही है। ऐसे में अमेरिकी प्रतिबंधों का संभावित असर श्रीलंका की अर्थव्यवस्था और व्यापार पर भी पड़ सकता है।

दूसरी ओर, जहाजों पर मौजूद लोगों की जरूरतों को नजरअंदाज करना भी मानवीय दृष्टि से गंभीर मुद्दा है। श्रीलंका को इस मामले में मानवीय सहायता और अपने अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बीच संतुलन बनाना होगा।

पहले भी ईरानी नाविकों की सहायता कर चुका है श्रीलंका

IRIS Dena के डूबने के बाद श्रीलंका ने बचाए गए ईरानी नाविकों को सहायता उपलब्ध कराई थी। इसके अलावा, तकनीकी खराबी के कारण एक अन्य ईरानी जहाज को श्रीलंका के बंदरगाह पर लाया गया था। उसके घायल नाविकों का स्थानीय अस्पतालों में उपचार किया गया था।

इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि श्रीलंका पहले भी ईरानी नाविकों की मदद कर चुका है। हालांकि, मौजूदा मामले में जहाजों की संख्या, उनकी स्थिति और संभावित प्रतिबंधों से जुड़े जोखिम के कारण फैसला अधिक जटिल हो गया है।

विशेषज्ञ बोले- हमले की स्थिति में सहायता देना जरूरी

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार दयान जयतिलके के मुताबिक, श्रीलंका के सामने व्यावहारिक सीमाएं हैं और उसे इस मामले में सावधानी से आगे बढ़ना होगा।

उनका कहना है कि मौजूदा जहाज युद्धपोत नहीं, बल्कि मालवाहक जहाज हैं, जो ईरान से चीन तक तेल ले जाने के काम में इस्तेमाल होते थे। यदि इन जहाजों पर हमला होता है और वे सहायता के लिए श्रीलंका के जलक्षेत्र में पहुंचते हैं, तो उन्हें मदद उपलब्ध कराना देश की नैतिक जिम्मेदारी होगी।

फिलहाल श्रीलंका के सामने सबसे बड़ी चुनौती जहाजों पर मौजूद लोगों की जरूरतों को पूरा करने का रास्ता निकालना है, जबकि अमेरिका के साथ अपने संबंधों और संभावित प्रतिबंधों के जोखिम को भी ध्यान में रखना है।