इजराइल में सत्ता बचाने के लिए नेतन्याहू चलेंगे बड़ा दांव? विपक्षी नेता के साथ सरकार बनाने को भी तैयार, 67 सांसदों का समर्थन मिलने की चर्चा
इजराइल की राजनीति में चुनाव के बाद सत्ता को लेकर घमासान तेज हो गया है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अब अपनी कुर्सी बचाने के लिए विपक्षी नेता गादी आइजेनकोट के साथ मिलकर सरकार बनाने का विकल्प भी खुला रख रहे हैं। इजराइली मीडिया i24 न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू को डर है कि आइजेनकोट अरब पार्टियों के समर्थन से वैकल्पिक सरकार बना सकते हैं। अगर ऐसा हुआ तो नेतन्याहू को प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ सकता है।
इसी राजनीतिक स्थिति को देखते हुए नेतन्याहू ने आइजेनकोट के साथ गठबंधन की संभावना से इनकार नहीं किया है। हालांकि, आइजेनकोट की तरफ से इस प्रस्ताव पर अभी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
दरअसल, रविवार को जॉइंट लिस्ट और राअम जैसी अरब पार्टियों ने आइजेनकोट को समर्थन देने का ऐलान किया था। इस समर्थन के बाद उनके पास 67 सांसदों का साथ होने की संभावना जताई जा रही है। यह बहुमत के लिए जरूरी 61 सीटों से 6 ज्यादा है।
गौरतलब है कि इजराइल में 27 अक्टूबर को हुए चुनाव में किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। देश की 120 सदस्यीय संसद में सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है।
चुनाव में नेतन्याहू के समर्थन वाले गठबंधन को 53 सीटें, आइजेनकोट के विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें और अरब पार्टियों को 19 सीटें मिली हैं। ऐसे में अब दोनों पक्ष सरकार बनाने के लिए अलग-अलग राजनीतिक समीकरण तैयार कर रहे हैं।
नेतन्याहू के पास सरकार बनाने के लिए कौन से 3 विकल्प?
1. विपक्षी दलों को अपने गठबंधन में शामिल करना
नेतन्याहू की पहली कोशिश विपक्षी गठबंधन में शामिल कुछ पार्टियों या सांसदों को अपने पक्ष में लाने की हो सकती है। विपक्ष के पास कुल 48 सीटें हैं। अगर कुछ सांसद या दल उनका समर्थन कर देते हैं, तो वह बहुमत के 61 सीटों के आंकड़े तक पहुंच सकते हैं।
हालांकि, यह रास्ता आसान नहीं है। विपक्षी दलों ने चुनाव में नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के मुद्दे पर जनता से समर्थन मांगा था। ऐसे में उनके लिए अब उन्हीं के साथ सरकार बनाना राजनीतिक रूप से मुश्किल हो सकता है। इससे उनके अपने समर्थकों में भी नाराजगी पैदा होने की आशंका है।
2. राष्ट्रीय एकता सरकार बनाने का विकल्प
नेतन्याहू विपक्षी नेता गादी आइजेनकोट और उनके सहयोगियों के साथ राष्ट्रीय एकता सरकार बनाने पर भी विचार कर सकते हैं। इस तरह की सरकार में अलग-अलग विचारधारा वाली पार्टियां मिलकर सत्ता चलाती हैं।
इस व्यवस्था में नेतन्याहू प्रधानमंत्री बने रह सकते हैं, जबकि आइजेनकोट और उनके सहयोगियों को भी सरकार में हिस्सेदारी मिल सकती है।
लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यह है कि आइजेनकोट चुनाव में नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के वादे के साथ मैदान में उतरे थे। उनके समर्थक भी नेतन्याहू के खिलाफ हैं। ऐसे में उनके लिए नेतन्याहू के नेतृत्व में सरकार बनाना आसान नहीं होगा।
3. अल्पमत सरकार बनाकर सत्ता बचाने की कोशिश
नेतन्याहू के पास अल्पमत सरकार बनाने का विकल्प भी मौजूद है। ऐसी सरकार के पास अपने गठबंधन में 61 सांसद नहीं होते, लेकिन वह दूसरे दलों के बाहरी समर्थन या उनके विरोध नहीं करने के भरोसे सत्ता चला सकती है।
इसके लिए उन्हें ऐसी पार्टियों का साथ जुटाना होगा, जो सरकार में शामिल हुए बिना संसद में महत्वपूर्ण मौकों पर उनका समर्थन करें।
हालांकि, अल्पमत सरकार के सामने सबसे बड़ी परेशानी बजट पास कराने और विश्वास मत हासिल करने की होगी। हर बड़े फैसले के लिए दूसरे दलों पर निर्भर रहना पड़ेगा। इसलिए ऐसी सरकार को लंबे समय तक चलाना मुश्किल हो सकता है।
आइजेनकोट के पास भी सरकार बनाने के 2 रास्ते
1. अरब पार्टियों के समर्थन से बहुमत हासिल करना
आइजेनकोट के सामने सबसे मजबूत विकल्प अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाने का है। चुनाव में उनके विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें मिली थीं, जबकि अरब पार्टियों के पास 19 सीटें हैं। दोनों का समर्थन मिलने पर कुल संख्या 67 हो सकती है।
इस तरह आइजेनकोट बहुमत के आंकड़े से काफी आगे निकल सकते हैं।
हालांकि, इस गठबंधन को लेकर इजराइल की राजनीति में विरोध भी है। नेतन्याहू लंबे समय से अरब पार्टियों के समर्थन से बनने वाली सरकार का विरोध करते रहे हैं। विपक्षी गठबंधन के भीतर भी इस मुद्दे पर सभी दल एकमत नहीं हैं। नेता लिबरमैन पहले ही इस तरह के गठबंधन की आलोचना कर चुके हैं।
2. यहूदी धार्मिक दलों को साथ लाने की कोशिश
आइजेनकोट अरब पार्टियों पर निर्भर रहने के बजाय कुछ यहूदी धार्मिक दलों को भी अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर सकते हैं।
इनमें यूनाइटेड तोराह जूडिज्म (UTJ) महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यह पार्टी अब खुद को नेतन्याहू के गठबंधन का हिस्सा नहीं मान रही है। पार्टी के नेता सरकार गठन को लेकर अपनी रणनीति पर चर्चा भी कर चुके हैं।
अगर UTJ और कुछ छोटे दल आइजेनकोट को समर्थन देने के लिए तैयार हो जाते हैं, तो उन्हें अरब पार्टियों के समर्थन पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
हालांकि, सेना में अनिवार्य सैन्य भर्ती जैसे मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच मतभेद हैं। ऐसे में इन दलों को एक साथ लाना भी बड़ी चुनौती होगी।
क्या नेतन्याहू भी अरब पार्टियों का समर्थन ले सकते हैं?
सीटों के गणित के हिसाब से नेतन्याहू के सामने भी अरब पार्टियों का समर्थन हासिल करने का विकल्प मौजूद है। उनके गठबंधन के पास 53 सीटें हैं। ऐसे में अरब पार्टियों के कुछ सांसदों का समर्थन मिलने पर वह बहुमत के आंकड़े तक पहुंच सकते हैं।
लेकिन राजनीतिक रूप से यह रास्ता काफी मुश्किल माना जा रहा है। नेतन्याहू खुद अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाने का विरोध करते रहे हैं। उनकी पार्टी और समर्थकों के लिए भी इस तरह के गठबंधन को स्वीकार करना आसान नहीं होगा।
वहीं, 19 सीटों वाली अरब पार्टियों ने फिलहाल आइजेनकोट की याशर पार्टी को समर्थन देने का फैसला किया है। वे सरकार में शामिल हुए बिना भी बाहर से समर्थन देकर विपक्षी गठबंधन को बहुमत दिला सकती हैं।
संसद के स्पीकर को हटाने की तैयारी में विपक्ष
सरकार बनाने की कोशिशों के बीच विपक्षी गठबंधन की नजर संसद के स्पीकर आमिर ओहाना को पद से हटाने पर भी है। ओहाना नेतन्याहू की लिकुड पार्टी के नेता और उनके करीबी माने जाते हैं। वह दिसंबर 2022 से संसद के स्पीकर हैं।
विपक्ष चाहता है कि संसद के कामकाज पर उसका नियंत्रण हो, ताकि कई महत्वपूर्ण विधेयकों को आगे बढ़ाया जा सके।
इनमें 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले को रोकने में हुई नाकामी की जांच के लिए स्वतंत्र सरकारी जांच आयोग बनाने का प्रस्ताव भी शामिल है।
हालांकि, नए स्पीकर के नाम पर विपक्षी दलों के बीच अभी सहमति नहीं बन पाई है। इस पद का महत्व इसलिए भी ज्यादा है, क्योंकि एक बार नया स्पीकर चुने जाने के बाद उसे हटाना आसान नहीं होगा। इसके लिए 120 सदस्यीय संसद में 90 सांसदों का समर्थन जरूरी होगा।
सरकार नहीं बनी तो इजराइल में फिर होंगे चुनाव?
अगर नेतन्याहू और आइजेनकोट दोनों ही 61 सांसदों का समर्थन जुटाने में नाकाम रहते हैं, तो इजराइल में दोबारा चुनाव कराने की नौबत आ सकती है।
हालांकि, अभी इसे अंतिम विकल्प ही माना जा रहा है। दोनों गठबंधनों के पास दूसरे दलों से बातचीत करने और समर्थन जुटाने के कई रास्ते मौजूद हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में इजराइल के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग की भी अहम भूमिका होगी। वह संसद में शामिल सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से मुलाकात करेंगे। इसके बाद पार्टियां बताएंगी कि वे किस नेता को सरकार बनाने की जिम्मेदारी देने की सिफारिश करती हैं।
राष्ट्रपति इन सिफारिशों के आधार पर तय करेंगे कि किस नेता को सरकार बनाने का मौका दिया जाए। अगर तय समय में कोई भी नेता बहुमत साबित नहीं कर पाता है, तो दोबारा चुनाव का रास्ता खुल सकता है।
इजराइल चुनाव के बाद अब तक क्या-क्या हुआ?
27 अक्टूबर: चुनाव में किसी को बहुमत नहीं मिला
इजराइल में संसदीय चुनाव हुए। चुनाव में 77.9% मतदान दर्ज किया गया। नेतन्याहू के गठबंधन को 53, आइजेनकोट के विपक्षी गठबंधन को 48 और अरब पार्टियों को 19 सीटें मिलीं। बहुमत के लिए 61 सीटों की जरूरत थी।
29 अक्टूबर: विदेशी दखल और वोट खरीदने के आरोप
लिकुड पार्टी ने अरब पार्टियों पर वोट खरीदने का आरोप लगाया। राअम पार्टी ने इन आरोपों को खारिज कर दिया। वहीं, शिन बेट ने विदेशी हस्तक्षेप के आरोपों की जांच शुरू की।
31 अक्टूबर: यहूदी-अरब गठबंधन के समर्थन में प्रदर्शन
इजराइल में लोगों ने यहूदी और अरब पार्टियों को साथ लेकर सरकार बनाने की मांग की। दूसरी तरफ नेतन्याहू समर्थकों ने ऐसे गठबंधन का विरोध किया।
1 नवंबर: आइजेनकोट ने सरकार गठन के लिए रखीं चार शर्तें
आइजेनकोट ने सरकार बनाने के लिए चार शर्तें रखीं। वहीं, जॉइंट लिस्ट ने संकेत दिया कि उनकी पार्टी नेतन्याहू को सत्ता से हटाने में विपक्ष की मदद करेगी और जरूरत पड़ने पर बाहर से समर्थन दे सकती है।
फिलहाल इजराइल की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नेतन्याहू अपनी कुर्सी बचाने में सफल होंगे या विपक्षी नेता गादी आइजेनकोट अरब पार्टियों के समर्थन से नई सरकार बनाकर सत्ता परिवर्तन कर देंगे। आने वाले दिनों में होने वाली राजनीतिक बैठकों और गठबंधन की बातचीत से इजराइल की अगली सरकार की तस्वीर साफ हो सकती है।