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US Midterm Election: 50 साल में रिपब्लिकन पार्टी की सबसे बड़ी हार, रिकॉर्ड फंड और मस्क का साथ भी नहीं बचा पाया ट्रम्प की साख

 

अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा झटका लगा है। पार्टी के पास चुनाव प्रचार के लिए रिकॉर्ड फंड था और दुनिया के सबसे अमीर कारोबारी एलन मस्क का भी समर्थन मिला था। इसके बावजूद डेमोक्रेटिक पार्टी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए रिपब्लिकन पार्टी की कई सीटें छीन लीं। इस हार को पिछले 50 साल में पार्टी के सबसे बड़े चुनावी झटकों में से एक माना जा रहा है।

चुनाव से करीब एक सप्ताह पहले रिपब्लिकन पार्टी के लगभग 25 चुनावी रणनीतिकारों ने वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए बैठक की थी। इस दौरान पार्टी के चुनावी सर्वे से जुड़े टोनी फैब्रिजियो ने मजाकिया अंदाज में पूछा कि वे पहले अच्छी खबर सुनना चाहेंगे या बुरी। इसके बाद डेटा सलाहकार टिम सेलर ने चुनाव के दो संभावित परिणामों पर चर्चा की।

पार्टी की चुनावी रणनीति संभाल रहे जेम्स ब्लेयर ने मजाक में कहा कि उन्होंने अपने अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू कर दी है और बाकी लोगों को भी ऐसा ही करना चाहिए। करीब 30 मिनट तक चली इस बातचीत में नेताओं ने जेल, राष्ट्रपति से माफी और देश छोड़ने जैसे मुद्दों पर भी व्यंग्य किया। चुनावी नतीजों ने उनकी आशंकाओं को सही साबित कर दिया।

रिकॉर्ड फंड और चुनावी रणनीति भी नहीं आई काम

एक साल पहले तक रिपब्लिकन पार्टी की इतनी बड़ी हार की संभावना कम मानी जा रही थी। पार्टी के पास प्रचार के लिए करीब 40 करोड़ डॉलर का फंड था। एलन मस्क ने भी उम्मीदवारों के समर्थन में बड़ी रकम खर्च की थी। इसके अलावा सीनेट चुनाव में पार्टी की स्थिति मजबूत मानी जा रही थी।

हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में बहुमत बढ़ाने के लिए ट्रम्प की टीम ने चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं बदलने की रणनीति भी अपनाई। आमतौर पर अमेरिका में हर 10 साल में परिसीमन होता है, लेकिन इस बार बीच दशक में ही चुनावी नक्शे में बदलाव की कोशिश की गई। इसका मकसद रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए जीत की संभावनाएं बढ़ाना था। इसके बावजूद पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ा।

1974 के वाटरगेट चुनाव से की जा रही तुलना

रिपब्लिकन पार्टी की मौजूदा हार की तुलना 1974 के चुनाव से की जा रही है। उस समय वाटरगेट कांड के बाद पार्टी ने प्रतिनिधि सभा की 48 और सीनेट की 4 सीटें गंवाई थीं। इस बार भी पार्टी को सीनेट में बड़ा नुकसान हुआ है। चुनाव से पहले उसके पास 53 सीटें थीं, जो दिए गए आंकड़ों के मुताबिक घटकर 44 रह गईं। वहीं, हाउस में भी शुरुआती रुझानों में पार्टी करीब 25 सीटें गंवाती दिखाई दी।

ईरान युद्ध ने ट्रम्प के चुनावी वादों पर खड़े किए सवाल

रिपब्लिकन पार्टी की हार के पीछे ईरान के साथ युद्ध को भी बड़ी वजह माना जा रहा है। राष्ट्रपति चुनाव के दौरान ट्रम्प ने अमेरिकी जनता से वादा किया था कि उनके नेतृत्व में अमेरिका नए युद्धों में नहीं उलझेगा। हालांकि, सत्ता में आने के बाद ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू होने से उनके इस वादे पर सवाल उठे।

युद्ध के कारण पेट्रोल की कीमतें बढ़ीं और महंगाई का दबाव भी बढ़ा। इससे आम अमेरिकी परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हुई। रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रम्प ने निजी बातचीत में यह सवाल भी उठाया था कि अगर ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू नहीं किया होता तो चुनाव के नतीजे क्या होते।

होर्मुज संकट और महंगे ईंधन ने बढ़ाई मुश्किल

ट्रम्प को शुरुआत में उम्मीद थी कि ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान जल्दी खत्म हो जाएगा और अमेरिका को बड़ी जीत मिलेगी। लेकिन युद्ध लंबा खिंचने के साथ होर्मुज स्ट्रेट बंद होने, पेट्रोल और खाद की कीमतें बढ़ने तथा अमेरिकी हथियारों के भंडार पर दबाव जैसी चुनौतियां सामने आईं।

युद्ध शुरू होने के कुछ समय बाद हुए सर्वे में कई मतदाताओं ने इस कार्रवाई के उद्देश्य पर सवाल उठाए। लोगों को लगने लगा कि राष्ट्रपति ने अपना चुनावी वादा तोड़ा है और युद्ध की आर्थिक कीमत आम जनता को चुकानी पड़ रही है। ट्रम्प के कुछ पुराने समर्थक भी युद्ध के विरोध में सामने आए।

जनता महंगाई से परेशान, ट्रम्प का ध्यान दूसरे मुद्दों पर

चुनाव से पहले ट्रम्प की कार्यशैली को लेकर उनकी अपनी टीम के कुछ सदस्य भी चिंतित थे। रिपोर्ट के मुताबिक, उन्हें लगता था कि राष्ट्रपति सीमा सुरक्षा और महंगाई जैसे मुद्दों की तुलना में अपने बॉलरूम, गोल्फ कोर्स और सरकारी इमारतों की सजावट पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।

चुनाव से पहले अपने आखिरी भाषण में भी ट्रम्प ने नेशनल मॉल के रिफ्लेक्टिंग पूल के नवीनीकरण का जिक्र किया और उसका नाम अपने नाम पर रखने की बात मजाक में कही। दूसरी ओर, आम अमेरिकी महंगे पेट्रोल, बढ़ती महंगाई और ईरान युद्ध को लेकर परेशान थे।

इस तरह रिपब्लिकन पार्टी की हार के पीछे केवल चुनावी रणनीति की कमजोरी नहीं, बल्कि युद्ध, आर्थिक दबाव और राष्ट्रपति की कार्यशैली जैसे मुद्दे भी अहम रहे। रिकॉर्ड फंड और बड़े नेताओं का समर्थन होने के बावजूद पार्टी मतदाताओं का भरोसा बनाए रखने में नाकाम रही।