US-Iran Conflict: अमेरिका के हमले के बाद ईरान का पलटवार, जॉर्डन में अमेरिकी ठिकानों पर दागीं बैलिस्टिक मिसाइलें; होर्मुज पर बढ़ा तनाव
नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। रविवार, 30 अगस्त 2026 को अमेरिकी सेना ने ईरान के लारक द्वीप पर कार्रवाई करते हुए दो रॉकेट लॉन्चरों को निशाना बनाया। अमेरिकी सेना के मुताबिक, ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के जवान होर्मुज जलडमरूमध्य में रॉकेट और समुद्री बारूदी सुरंगें तैनात करने की तैयारी कर रहे थे। इसी के बाद अमेरिकी सेना ने हमला किया।
अमेरिकी कार्रवाई के कुछ समय बाद ईरान की ओर से भी जवाबी हमला किया गया। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प यानी IRGC ने दावा किया कि उसने जॉर्डन में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बैलिस्टिक मिसाइलों से निशाना बनाया है। इस घटनाक्रम के बाद पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ गया है।
लारक द्वीप पर अमेरिका ने क्यों किया हमला?
अमेरिकी सेना के अनुसार, ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के जवान होर्मुज स्ट्रेट में रॉकेट लॉन्चरों और समुद्री बारूदी सुरंगों का इस्तेमाल करने की तैयारी कर रहे थे। अमेरिकी सेना ने इसी संभावित कार्रवाई को रोकने के लिए लारक द्वीप पर मौजूद दो रॉकेट लॉन्चरों को निशाना बनाया।
रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी ड्रोन के जरिए यह कार्रवाई की गई। यह 30 जुलाई के बाद ईरान पर अमेरिका की पहली सैन्य कार्रवाई बताई जा रही है।
ईरान ने अमेरिका पर लगाए गंभीर आरोप
ईरान के सरकारी ब्रॉडकास्टर IRIB के मुताबिक, IRGC ने दावा किया है कि अमेरिकी हमले में ईरानी लड़ाकों के साथ आम नागरिक भी मारे गए और घायल हुए हैं।
IRGC ने अमेरिकी कार्रवाई को लेकर बयान जारी करते हुए कहा कि लारक द्वीप पर हुए हमले के जवाब में उसकी एयरोस्पेस फोर्स ने एक संयुक्त मिसाइल ऑपरेशन शुरू किया।
हालांकि, ईरान की ओर से किए गए नुकसान संबंधी दावों की स्वतंत्र पुष्टि तत्काल उपलब्ध नहीं थी।
जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बनाया निशाना
ईरान ने अपने जवाबी हमले में जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने का दावा किया है। IRGC के अनुसार, किंग हुसैन और अल-अजराक एयरबेस पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागी गईं।
ईरानी पक्ष का दावा है कि इन ठिकानों पर अमेरिकी लड़ाकू विमानों की तैनाती के स्थानों के अलावा तकनीकी और रखरखाव से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर को भी निशाना बनाया गया।
अमेरिकी या जॉर्डन के अधिकारियों की ओर से नुकसान की पूरी स्वतंत्र पुष्टि होने तक इन दावों को सावधानी से देखना जरूरी है।
ज्यादातर मिसाइलों को रोकने का दावा
अमेरिकी हमले के बाद जॉर्डन की दिशा में मिसाइल हमले की खबर सामने आई। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, आने वाली अधिकांश मिसाइलों को हवा में ही रोक दिया गया और फिलहाल बड़े पैमाने पर नुकसान की पुष्टि नहीं हुई है।
इस घटनाक्रम ने क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। अगर मिसाइल और ड्रोन हमले आगे भी जारी रहते हैं, तो अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव के और बढ़ने की आशंका बनी हुई है।
होर्मुज स्ट्रेट पर बढ़ी चिंता
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव का सबसे बड़ा असर होर्मुज जलडमरूमध्य पर पड़ सकता है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुताबिक, ईरान पर नाकेबंदी दोबारा लागू किए जाने के बाद 83 जहाजों ने अपना रास्ता बदला है। समुद्री मार्ग में बढ़ते सैन्य तनाव के कारण जहाजों और अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों को अपनी रणनीति बदलनी पड़ रही है।
दुनिया की नजर अब होर्मुज पर
होर्मुज स्ट्रेट से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और ऊर्जा उत्पादों का अंतरराष्ट्रीय व्यापार होता है। ऐसे में यहां किसी भी बड़े सैन्य टकराव या समुद्री यातायात में बाधा का सीधा असर वैश्विक तेल कीमतों पर पड़ सकता है।
भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए भी यह स्थिति महत्वपूर्ण है। अगर क्षेत्र में तनाव लंबे समय तक बना रहता है और तेल की आपूर्ति प्रभावित होती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
अमेरिका-ईरान तनाव में आगे क्या?
लारक द्वीप पर अमेरिकी हमला और उसके बाद जॉर्डन में अमेरिकी ठिकानों पर ईरानी जवाबी कार्रवाई ने हालात को और गंभीर बना दिया है। फिलहाल सबसे बड़ी चिंता यह है कि दोनों देशों के बीच जवाबी सैन्य कार्रवाई का सिलसिला आगे न बढ़े।
आने वाले दिनों में होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही, अमेरिकी सैन्य ठिकानों की सुरक्षा और ईरान की अगली कार्रवाई पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी। यदि तनाव और बढ़ता है, तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ सकता है।