US Election: अमेरिका में 2 लाख भारतीय मूल के वोटर्स के नाम कटने का दावा, ट्रम्प प्रशासन की वोटर लिस्ट जांच पर विवाद
अमेरिका में आगामी मिडटर्म चुनाव से पहले वोटर लिस्ट की जांच और मतदाताओं के नाम हटाए जाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 26 राज्यों में करीब 2 लाख भारतीय मूल के मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं। इन राज्यों में रिपब्लिकन पार्टी की सरकार होने की बात भी कही गई है। हालांकि, इन आंकड़ों और नाम हटाने के पीछे की वजहों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।
अमेरिका में भारतीय मूल के मतदाता चुनावी राजनीति में अहम भूमिका निभाते हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, देश में करीब 21 लाख भारतवंशी मतदाता हैं। 3 नवंबर को होने वाले मिडटर्म चुनाव में प्रतिनिधि सभा और सीनेट की सीटों के लिए मुकाबला होगा। इन चुनावों के नतीजे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के राजनीतिक एजेंडे और रिपब्लिकन पार्टी की स्थिति पर असर डाल सकते हैं।
वोटर लिस्ट की जांच क्यों कर रहा है अमेरिकी प्रशासन?
ट्रम्प प्रशासन का कहना है कि वोटर लिस्ट की जांच का उद्देश्य अयोग्य मतदाताओं के नाम हटाना और चुनाव प्रक्रिया को सुरक्षित बनाना है। इसी संदर्भ में ट्रम्प ‘सेव अमेरिका एक्ट’ का समर्थन कर रहे हैं। इस प्रस्ताव के तहत मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने के लिए अमेरिकी नागरिकता के प्रमाण और मतदान के दौरान पहचान से जुड़े नियम सख्त करने की बात कही गई है।
हालांकि, इस तरह के नियमों को लेकर अमेरिका में राजनीतिक मतभेद हैं। प्रस्ताव के समर्थकों का कहना है कि इससे चुनाव में गड़बड़ी रोकने में मदद मिलेगी। वहीं, विरोधियों का तर्क है कि जन्म प्रमाण पत्र या पासपोर्ट जैसे दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने पर पात्र नागरिकों को भी पंजीकरण कराने या वोट डालने में मुश्किल हो सकती है।
भारतीय मूल के वोटर्स क्यों हैं अहम?
भारतीय मूल के अमेरिकी मतदाताओं का रुझान पिछले कुछ चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर अधिक रहा है। 2024 के राष्ट्रपति चुनाव को लेकर उपलब्ध सर्वेक्षणों में भी कमला हैरिस को भारतीय मूल के मतदाताओं का बड़ा समर्थन मिलने की बात सामने आई थी। हालांकि, सभी भारतीय मूल के मतदाता एक ही पार्टी का समर्थन करते हों, ऐसा नहीं है।
यदि बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए जाते हैं, तो इसका असर उनकी मतदान में भागीदारी पर पड़ सकता है। लेकिन केवल वोटर लिस्ट से नाम हटने के दावे के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि ऐसा किसी खास समुदाय या राजनीतिक दल को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया है।
चुनाव में धांधली के दावों पर भी विवाद
ट्रम्प चुनावों में बड़े पैमाने पर धांधली होने के आरोप लगाते रहे हैं। हालांकि, पिछले चुनावों को लेकर किए गए कई व्यापक दावों के समर्थन में पर्याप्त सबूत सामने नहीं आए। ब्रेनन सेंटर फॉर जस्टिस सहित विभिन्न संस्थाओं के शोध में भी अमेरिका में चुनावी धोखाधड़ी की घटनाओं को दुर्लभ बताया गया है।
वोटर लिस्ट की जांच के समर्थक इसे चुनावी पारदर्शिता से जोड़ते हैं, जबकि आलोचकों का कहना है कि सख्त नियम पात्र मतदाताओं के लिए बाधा बन सकते हैं। इस मुद्दे पर अमेरिकी राजनीति में बहस जारी है।
ट्रम्प की लोकप्रियता और रिपब्लिकन पार्टी की चिंता
चुनाव से पहले ट्रम्प की लोकप्रियता और उनकी नीतियों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। खबर में उद्धृत AP-NORC सर्वे के अनुसार, करीब 30% अमेरिकी उनके कामकाज से संतुष्ट थे। अर्थव्यवस्था के मामले में उनकी अप्रूवल रेटिंग 26% और महंगाई से निपटने के मामले में 17% बताई गई है।
महंगाई और बढ़ती कीमतें अमेरिकी मतदाताओं के लिए प्रमुख मुद्दे बने हुए हैं। ऐसे में मिडटर्म चुनाव रिपब्लिकन पार्टी के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। हालांकि, चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन केवल राष्ट्रपति की लोकप्रियता पर नहीं, बल्कि स्थानीय उम्मीदवारों, आर्थिक परिस्थितियों और अलग-अलग राज्यों के राजनीतिक समीकरणों पर भी निर्भर करेगा।