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US-China Arms Deal: अमेरिका चीन को हथियार क्यों नहीं बेचता? ट्रंप के बयान के बाद फिर चर्चा में आया पुराना प्रतिबंध
 

 

अमेरिका और चीन के बीच हथियारों की बिक्री का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है. अमेरिकी राजदूत डेविड परड्यू ने दावा किया था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से अमेरिकी हथियार खरीदने में उनकी दिलचस्पी के बारे में पूछा था. हालांकि, ट्रंप ने इस दावे से दूरी बनाते हुए कहा कि उन्हें ऐसी किसी बातचीत की जानकारी नहीं है और संभव है कि राजदूत का इशारा ताइवान से जुड़ी हथियार बिक्री की ओर रहा हो. अमेरिकी विदेश विभाग ने भी स्पष्ट किया कि मौजूदा अमेरिकी कानून चीन को हथियारों की बिक्री पर रोक लगाता है और चीन को हथियार बेचने की कोई योजना या प्रस्ताव नहीं है. 
इस घटनाक्रम के बाद सवाल उठ रहा है कि आखिर अमेरिका चीन को हथियार बेचने से क्यों रोकता है और इसके पीछे कौन-कौन से बड़े कारण हैं?
1989 के बाद से हथियारों की बिक्री पर पाबंदी
अमेरिका और चीन के सैन्य संबंधों में बड़ा बदलाव 1989 के बाद आया. तियानआनमेन की घटनाओं के बाद अमेरिका ने चीन पर हथियारों और सैन्य तकनीक के निर्यात को लेकर कड़े प्रतिबंध लगाए. इसके बाद बीजिंग को अमेरिकी सैन्य उपकरणों की बिक्री सामान्य रक्षा व्यापार की तरह नहीं रही.
मौजूदा अमेरिकी नीति में चीन को हथियार बेचने पर कानूनी रोक एक प्रमुख बाधा है. अमेरिकी विदेश विभाग ने ट्रंप-परड्यू विवाद के बीच भी यही स्थिति दोहराई है कि अमेरिकी कानून चीन को हथियारों की बिक्री की अनुमति नहीं देता. 


अमेरिका-चीन की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा
हथियारों की बिक्री का सवाल केवल कारोबारी लेनदेन तक सीमित नहीं है. अमेरिका और चीन के बीच सैन्य, तकनीकी और रणनीतिक क्षेत्रों में लंबे समय से प्रतिस्पर्धा है.
ऐसे में चीन को अत्याधुनिक अमेरिकी सैन्य तकनीक उपलब्ध कराने से अमेरिकी सुरक्षा और रक्षा तकनीक से जुड़े सवाल उठ सकते हैं. यही कारण है कि चीन को अमेरिकी रक्षा उपकरण बेचने का मामला दूसरे देशों को हथियारों की बिक्री से अलग माना जाता है.
ताइवान बना सबसे संवेदनशील मुद्दा
अमेरिका-चीन हथियार संबंधों में ताइवान की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. अमेरिका चीन के साथ अपने संबंधों में 'वन चाइना' नीति का पालन करता है, लेकिन ताइवान के साथ अनौपचारिक संबंध बनाए रखता है.
अमेरिकी Taiwan Relations Act के तहत अमेरिका ताइवान को उसकी आत्मरक्षा की क्षमता बनाए रखने के लिए रक्षा उपकरण उपलब्ध कराता है. चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और अमेरिकी हथियारों की बिक्री का लगातार विरोध करता रहा है. 
यही वजह है कि बीजिंग के साथ हथियारों का कोई सौदा केवल व्यापारिक फैसला नहीं होगा, बल्कि इसका सीधा असर अमेरिका-चीन और अमेरिका-ताइवान संबंधों पर पड़ सकता है.


चीन को हथियार देने का मतलब तकनीक साझा करना भी
अमेरिकी हथियारों में कई ऐसी तकनीकें शामिल होती हैं जिन्हें वाशिंगटन अपनी सुरक्षा नीति के लिहाज से संवेदनशील मानता है. चीन को ऐसे उपकरण उपलब्ध कराने पर तकनीक के इस्तेमाल, उसके विश्लेषण और आगे संभावित सैन्य उपयोग को लेकर चिंता पैदा हो सकती है.
इसके अलावा चीन खुद भी बड़े पैमाने पर सैन्य तकनीक विकसित कर रहा है. इसलिए अमेरिकी रक्षा उपकरणों की बिक्री को दोनों देशों के बीच व्यापक सैन्य प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में देखा जाता है.
ट्रंप के बयान से क्यों बढ़ी चर्चा?
डेविड परड्यू के दावे और ट्रंप के बाद के बयान ने इस मुद्दे को फिर सुर्खियों में ला दिया. परड्यू ने कहा था कि ट्रंप ने शी से अमेरिकी हथियार खरीदने की संभावना के बारे में पूछा था, जबकि ट्रंप ने कहा कि उन्हें ऐसी बातचीत याद नहीं है और शायद बात ताइवान की हो रही थी. अमेरिकी विदेश विभाग ने भी कहा कि चीन को हथियार बेचने की कोई योजना या प्रस्ताव नहीं है. 
इसलिए फिलहाल अमेरिका की मौजूदा स्थिति में कोई औपचारिक बदलाव सामने नहीं आया है. चीन को अमेरिकी हथियारों की बिक्री का सवाल कानून, राष्ट्रीय सुरक्षा, ताइवान नीति और दोनों देशों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा से जुड़ा हुआ है.
इसमें मौजूदा ट्रंप-परड्यू विवाद को पुराने अमेरिकी हथियार प्रतिबंध और ताइवान नीति के साथ जोड़कर रखा गया है, ताकि खबर सिर्फ बयान पर नहीं बल्कि उसके पीछे की पूरी पृष्ठभूमि पर केंद्रित रहे।